सुप्रभात – प्रभाकर शुक्ल

Early morning has some magical moments when darkness give way to early diffused rays of light. The word starts to wake up slowly. Here is a poem describing the scene. Rajiv Krishna Saxena

सुप्रभात

नयन से नयन का नमन हो रहा है,
लो उषा का आगमन हो रहा है।

परत पर परत चांदनी कट रही है,
तभी तो निशा का गमन हो रहा है।

क्षितिज पर अभी भी हैं अलसाए सपने,
पलक खोल कर भी, शयन हो रहा है।

झरोखों से प्राची कि पहली किरण का,
लहर से प्रथम आचमन हो रहा है।

हैं नहला रहीं, हर कली को तुषारें
लगन पूर्व कितना जतन हो रहा है।

वही शाख पर हैं पक्षियों का कलरव,
प्रभाती सा लेकिन, सहन हो रहा है।

बढ़ी जा रही है जिस तरह से अरुणिमा,
है लगता कहीं पर हवन हो रहा है।

मधुर मुक्त आभा, सुगन्धित पवन है,
नए दिन का कैसा सृजन हो रहा है।

∼ डॉ. प्रभाकर शुक्ल

Check Also

Message for the new bride

पुत्र वधू से – प्रतिभा सक्सेना

A new bride comes home. Mother of the groom welcomes her. Pratibha Ji has so …

One comment

  1. विजय कुमार निश्चल

    प्रभाकर शुक्ल जी के विषय में पूरी जानकारी मिल सकती है तो कृपया बताईये

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *