आँख - सूर्यकुमार पांडेय

आँख – सूर्यकुमार पांडेय

Eyes are our organ that not only introduce us to the world but can be used to convey myriad sentiments. Rajiv Krishna Saxena

आँख

कुछ की काली कुछ की भूरी
कुछ की होती नीली आँख
जिसके मन में दुख होता है
उसकी होती गीली आँख।

सबने अपनी आँख फेर ली
सबने उससे मीचीं आँख
गलत काम करने वालों की
रहती हरदम नीची आँख।

आँख गड़ाते चोर–उचक्के
चीज़ों को कर देते पार
पकड़े गये चुराते आँखें
आँख मिलाने से लाचार।

आँख मिचौनी खेल रहे हम
सबसे बचा बचा कर आँख
भैया जी मुझको धमकाते
अक्सर दिखा दिखा कर आँख

आँख तुम्हारी लाल हो गई
उठने में क्यों करते देर
आँख खोल कर काम करो सब
पापा कहते आँख तरेर।

मम्मीं आँख बिछाए रहतीं
जब तक हमें न लेतीं देख
घर भर की आँखों के तारे
हम लाखों में लगते एक।

~ सूर्यकुमार पांडेय

लिंक्स:

 

Check Also

बाल गीता – भाग ७- Cartoon Animation for children

बाल गीता – भाग ७- (Cartoon Animation for children) राजीव कृष्ण सक्सेना

बाल गीता – भाग ७- Cartoon Animation for children Arjuna requested the Lord to show …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *