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Posted on Feb 2, 2016 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

दरवाजे बंद मिले – नरेंद्र चंचल

दरवाजे बंद मिले – नरेंद्र चंचल

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Nothing works at times and the feeling of frustration is overbearing. Here is a nice poem by Narendra Chanchal- Rajiv Krishna Saxena

बार–बार चिल्लाया सूरज का नाम
जाली में बांध गई केसरिया शाम
दर्द फूटना चाहा
अनचाहे छंद मिले
दरवाज़े बंद मिले।

गंगाजल पीने से हो गया पवित्र
यह सब मृगतृष्णा है‚ मृगतृष्णा मित्र
नहीं टूटना चाहा
शायद फिर गंध मिले
दरवाज़े बंद मिले।

धीरे से बोल गई गमले की नागफनी
साथ रहे विषधर पर चंदन से नहीं बनी
दर्द लूटना चाहा
नये–नये द्वंद मिले
दरवाज़े बंद मिले।

∼ नरेंद्र चंचल

 
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