Lonely again !
वह प्यार था कि पहाड़ का झरना रहा जो बह गया, मैं फिर अकेला रह गया

मैं फिर अकेला रह गया – दिनेश सिंह

Someone leaves and someone is left behind lonely and crushed. Here is a lovely poem by Dinesh Singh. Rajiv Krishna Saxena

मैं फिर अकेला रह गया

 

बीते दिसंबर तुम गए
लेकर बरस के दिन नए
पीछे पुराने साल का
जर्जर किला था ढह गया
मैं फिर अकेला रह गया

खुद आ गए
तो भा गए
इस ज़िन्दगी पर छा गए
जितना तुम्हारे पास था
वह दर्द मुझे थमा गए

वह प्यार था कि पहाड़ का
झरना रहा जो बह गया
मैं फिर अकेला रह गया

रे साइयाँ, परछाइयाँ
मरुभूमि की ये खाइयाँ
सुधि यों लहकती
ज्यों कि लपटी
आग की अँगनाइयाँ

हिलता हुआ पिंजरा टँगा ही रह गया
पंछी दह गया
मैं फिर अकेला रह गया

तुम घर रहो
बाहर रहो
ऋतुराज के सर पर रहो
बौरी रहें अमराइयाँ
पिक का पिहकता स्वर रहो

ये बोल आह–कराह के
हारा–थका मन कह गया
मैं फिर अकेला रह गया

~ दिनेश सिंह

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2 comments

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति दी है…❤️

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