धर्म है – गोपाल दास नीरज

धर्म है – गोपाल दास नीरज

Here is a lovely poem of Gopal Das Neeraj that tells us that challenges must be met head-on and are not to be avoided. Rajiv Krishna Saxena

धर्म है

जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना
उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है।

जिस वक्त जीना गैर मुमकिन सा लगे
उस वक्त जीना फ़र्ज है इन्सान का
लाज़िम लहर के साथ है तब खेलना
जब हो समुन्दर पे नशा तूफ़ान का
जिस वायु का दीपक बुझना ध्येय हो
उस वायु में दीपक जलाना धर्म है।

हो नहीं मंज़िल कहीं जिस राह की
उस राह चलना चाहिये इंसान को
जिस दर्द से सारी उमर रोते कटे
वह दर्द पाना है जरूरी प्यार को
जिस चाह का हस्ती मिटाना नाम है
उस चाह पर हस्ती मिटाना धर्म है।

आदत पड़ी हो भूल जाने की जिसे
हरदम उसी का नाम हो हर सांस पर
उसकी ख़बर में ही सफ़र सारा कटे
जो हर नज़र से हर तरह हो बेखबर
जिस आंख का आंखें चुराना काम हो
उस आंख से आंखें मिलाना धर्म है।

जब हाथ से टूटे न अपनी हथकड़ी
तब मांग लो ताकत स्वयं जंज़ीर से
जिस दम न थमती हो नयन सावन झड़ी
उस दम हंसी ले लो किसी तस्वीर से
जब गीत गाना गुनगुनाना जुर्म हो
तब गीत गाना गुनगुनाना धर्म है।

∼ गोपाल दास नीरज

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