दरवाजे बंद मिले – नरेंद्र चंचल

दरवाजे बंद मिले – नरेंद्र चंचल

Nothing works at times and the feeling of frustration is overbearing. Here is a nice poem by Narendra Chanchal- Rajiv Krishna Saxena

दरवाज़े बंद मिले

बार–बार चिल्लाया सूरज का नाम
जाली में बांध गई केसरिया शाम
दर्द फूटना चाहा
अनचाहे छंद मिले
दरवाज़े बंद मिले।

गंगाजल पीने से हो गया पवित्र
यह सब मृगतृष्णा है‚ मृगतृष्णा मित्र
नहीं टूटना चाहा
शायद फिर गंध मिले
दरवाज़े बंद मिले।

धीरे से बोल गई गमले की नागफनी
साथ रहे विषधर पर चंदन से नहीं बनी
दर्द लूटना चाहा
नये–नये द्वंद मिले
दरवाज़े बंद मिले।

∼ नरेंद्र चंचल

लिंक्स:

 

Check Also

तब रोक ना पाया मैं आंसू

तब रोक न पाया मैं आँसू – हरिवंश राय बच्चन

When life-long delusions end and we suddenly discover the truth, a heart-break invariably follows. So …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *