So temporary! What is the point of life?!
एक ही दुकान में सजे हैं सब खिलौने।, खोटे–खरे, भले–बुरे, सांवरे सलोने। कुछ दिन तक दिखे सभी सुंदर चमकीले। उड़े रंग, तिरे अंग, हो गये घिनौने।

कांच का खिलौना- आत्म प्रकाश शुक्ल

Life is so short. At times it seems rather pointless and absurd. Here is a very down to earth perspective on life that is very Indian. Rajiv Krishna Saxena

कांच का खिलौना

माटी का पलंग मिला राख का बिछौना।
जिंदगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना।
एक ही दुकान में सजे हैं सब खिलौने।
खोटे–खरे, भले–बुरे, सांवरे सलोने।
कुछ दिन तक दिखे सभी सुंदर चमकीले।
उड़े रंग, तिरे अंग, हो गये घिनौने।
जैसे–जैसे बड़ा हुआ होता गया बौना।
जिंदगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना।

मौन को अधर मिले अधरों को वाणी।
प्राणों को पीर मिली पीर की कहानी।
मूठ बांध आये चले ले खुली हथेली।
पांव को डगर मिली वह भी आनी जानी।
मन को मिला है यायावर मृग–छौना।
जिंदगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना।

शोर भरी भोर मिली बावरी दुपहरी।
सांझ थी सयानी किंतु गूंगी और बहरी।
एक रात लाई बड़ी दूर का संदेशा।
फैसला सुनाके ख़त्म हो गई कचहरी।
औढ़ने को मिला वही दूधिया उढ़ौना।
जिंदगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना।

~ आत्म प्रकाश शुक्ल

लिंक्स:

 

Check Also

Thanks at retirement function

धन्यवाद – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

Here is a moving poem by Shivmangal Singh Suman Ji. Towards the end of the …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *