पाठकों द्वारा प्रेषित कविताएं

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पाठकों द्वारा प्रेषित कुछ कविताएं

 

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मैं और तुम्हारी खाली कुर्सी

मैं और तुम्हारी खाली कुर्सी

मैं और तुम्हारी खाली कुर्सी अक्सर बातें करते हैं,
तुम होती तो ये ना होता,
तुम होती तो ये जल्दी हो जाता।
20 फोन कम आते,
और हम शांति से सोजाते।
मानो जैसे तूफान उठा हैं दफ्तर में,
और उठे भी क्यों ना, तुम जो ना हो कुर्सी में।
सारी शिकायतें, बैंक और ऋण विभाग,
रह गए सब असहाय।

पहले स्ट्रेस गुज़रता था मुझे छूकर,
अब मैं बन गयी हूँ जैसे प्रेशर कुकर।
कोशिश तो पूरी हैं, हो सब ठीक,
तुमसे ही सीखी हूँ, रहूँगी मैं भी ढ़ीठ।
जब जल्दबाज़ी मे होती थी गलती,
संभाल लुंगी, डरो मत, जब तुम थी कहती,
लगता था जाके किसी गड्ढे में गिर जाऊँ।

याद कर रहे सब तुम्हे,
करती थी काम बेहतरीन, याद आ रहे वो लम्हें।
“काम”, क्या इतनी ही हैं हमारी परिभाषा?
जब की मैने आँखे बंद, मिली एक आशा,
दिखी तुम्हारी बेहतरीन मुस्कान,
तुम्हारे कपड़ो के अलग-अलग रंग।
तुम्हारा टिफिन आगे बढ़ाना,
“अच्छे से लो ना, तुम्हें तो पसंद हैं” कहना।
त्योहारों पर रील बनाना, खुशी से सजके आना।
खुद अपना हेयरकट करना,
किताबों की बातें करना।
यूँ ही गहरी बात बोल जाना,
कही तो लिखूँगी इसे, ऐसा मेरे मन मे आजाना।

तुम्हारा हस्ता हुआ चेहरा,
आँखों मे नमी हो बेशक पर होंठ हमेशा मुस्काते, मानो राज़ हो कोई गेहरा।
हमारा सुख-दुख बाटना,
हँसना, मुश्किल वक्त भी खुशी से काटना।
वो खाली कुर्सी सिर्फ एक एम्प्लॉयी नहीं मेरी दोस्त की हैं,
ये एहसास हुआ और जब आँखें खोली मैने, उनमे थी एक भावना, नमी भी,
नहीं बनी मैं मशीन अभी, हुँ मैं इंसान ही।

तुम जहाँ रहो खुश रहो, आबाद रहो,
करने दो लोगो को याद तुम्हें,
गिनने दो दिन उन्हें।
जिनको हैं सिर्फ काम से काम,
जो लगाते हैं हर चीज़ का दाम।

अस्मिता अमोल श्रीमंदिलकर (Oct 6, 2026)

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Hanumant Kumar Dubey
खिड़कियाँ और ख़्वाब
अक्सर झोपड़ी में बैठ…
इमारतों की खिड़कियाँ गिनता हूँ।
अनेक रंग, अनेक राग…
ख़्वाबों में बुनता हूँ।
पर्दे हैं खिड़कियों पर,
पर दिखता सब कुछ है…
खिड़कियाँ अनेक हैं,
पर हर रोज़ किसी एक को चुनता हूँ।
एक बच्चा है माँ की बाँहों में…
एक बाप कुछ कह रहा है…
एक लड़की है बालकनी में,
चुपके से कोई छत पर चढ़ रहा है…
कोई हँस रहा है…
कोई हँसने की आरज़ू में है…
कोई हार गया ज़िंदगी…
कोई जीने की ख़्वाहिश लिए है…
बत्तियाँ बुझ गई हैं…
इमारतें काली हो गईं…
अब सारी खिड़कियाँ एक-सी लगती हैं।
न शोर है, न मुस्कुराहट,
अब सिसकियाँ भी नहीं सुनाई दे रहीं…
अब सबको मिल गई राहत…
मैं भी आँखें मूँद लेता हूँ…
अब सब कुछ धुँधला दिखाई दे रहा है…
अब तो ख़्वाब देखने का वक़्त आ चुका…!
हनुमंत कुमार दूबे  (Oct 3, 2026)

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कभी कोई आया ही नहीं

कल चौखट पर वो मासूम सा हाथ
कल नुक्कड़ पर वो तुतलतीजुबान
कल गली के छोर पे वो साँवली सूरत
कल घर के दरवाजे वो नन्हे-नन्हे पाँव
सब अजनबी थे रंग से रूप से
पर दिल से कुछ कुछ अपने थे

वो हाथ आज रोटी माँग रहे थे
वो जुबान की मीठास पानी माँग रही थी
वो साँवली सूरत कुछ जवाब माँग रही थी
वो नन्हे कदमों से एक पता माँग रहे थे
वो पता माँग रहे थे कामियाबी का
वो जवाब माँग रहे थे अपनी मासूमियत का

जिन हाथों में कलम चाहिए थी
ना जाने कब कटोरी आ गयी
वो भी खाली थी सालों से
जो जुबान शान होती किसी मंच का
वो कुछ यूँ सूखने जा रही थी
वो साँवली सी सूरत जो शायद कुछ
बया करती अपनी खूबसूरती से

पर वो कल मेरे गाड़ी के शीशे में
अपनी मासूमियत माँग रही थी
वो नन्हे कदम ढूंढ रहे थे अपना बचपन
पर खो गया था वो तो कहीं
शिकायत का मौसम आया ही नहीं
शिकवा की धूप तो छाई ही नहीं
गिला तो किससे करते, कोई अपना आया नहीं!

ममता गोलछा 

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कागज़ी कायर

हिजाब और घूँघट में लोग,
आज़ादी पर कलाम लिख रहे हैं।
“ये पर्दा कोई बंदिश थोड़ी है”,
ये घर के कोतवाल कह रहे हैं।

मैं भी अलग थोड़े ही हूँ,
मेरे घर में भी —
महिलाएँ चूल्हा जलाती हैं।
मैं भी एक झूठा, दोगला लेखक हूँ,
पर मेरे मुक्तकों में बगावत सजी है —
किंतु-परंतु ये बगावत,
मेरे घर के भीतर न हो।

कोई भी व्यक्ति — आज़ादी न माँगे,
जो चूल्हा जलाता है — वही जलाए,
जो कपड़े धोता है — वही धोए,
जो बच्चे पैदा करता है — वही करे,
जो पर्दे में रहता है — वही रहे,
जो हमेशा दर्द सहता है — वही सहे।

खवातीन-ओ-हज़रात! मैं,
आज़ादी पे नज़्म कहता रहूँगा,
झूठा ज्ञान दूँगा और
बिकता रहूँगा…
इश्क पे लिखूँगा, बनूँगा ‘टूटा शायर’,
और बोलेगी मेरी लेखनी – “ओ कागज़ी कायर!”

पर क्यों?
क्योंकि ये लेखनी जानती है —
असलियत मेरे घर की।
जानती है दर्द – काटे गए परों का।
मेरी माँ के, तवे पर जले काले हाथ,
मेरे कलामों की स्याही से गहरे हैं —
यहाँ महफ़िल में जो भी
शख्स हैं — बहरे हैं।

ये बहरे हैं क्योंकि —
घर जाके जो था, वही रहेगा।
सच्चाई तालियों की आवाज़ से,
उड़ के हवा में घुल जाएगी।
बगावत हाथ-पाँव धोते ही —
धुल जाएगी।

ये बगावत बस दूर से अच्छी लगती है,
बगावत करने वाले — फाँसी पे मर गए,
और करवाने वाले — गोली से।
यहाँ जो ज़िंदा हैं, सब के सब —
हर व्यक्ति — दोगला है।
मैं एक लेखक हूँ और मैं,
दोगला हूँ।

हर्ष नाथ झा

कोहरा और आख़िरी ख़त

 

इस पल में कोहरा भी था और धुंध भी,
पर तुम्हारी नज़रों ने बरसों पुराना अंधेरा मिटाया था।
फिर न जाने क्यों, आज फिर वही दबा हुआ कोहरा
मेरे चारों ओर उतर आया है…
जैसे कोई पुरानी टीस फिर से साँस लेने लगी हो।

तुम्हारी नज़रों का जो पहरा मुझ पर कभी था,
आज फिर उसकी हल्की-सी परछाई महसूस होती है।
वो एहसास मुझे कहीं बहुत दूर खींच ले जाता है—
जहाँ उम्मीदें धुंधली हैं, पर ज़िंदा हैं,
जहाँ बीता हुआ वक़्त राख है, पर उसमें चिंगारियाँ बाकी हैं।

अतीत की तस्वीरों को एक किनारे रख कर
जब मैं खुद को सामने से देखती हूँ,
तो लगता है—
“कहीं न कहीं, अब भी मेरा कोई हिस्सा ज़िंदा है।”
जो आज भी एक सच्चे सुकून की एक झिलमिल पल में जी लेता है।

कई बार चलते-चलते पैर रुक जाते हैं,
पीछे मुड़कर देखने पर लगता है—
मेरी उम्र का एक ख़त व्यर्थ हो गया,
जिसमें दिल के महबूब का पता लिखा था,
पर किस्मत ने वह पता कभी पढ़ा ही नहीं।

हर रात जैसे कोई रूह का फ़कीर
रोशनी आने की बात करता है।
कुछ पल, मन सुकून से भर जाता है—
उन यादों में जहाँ जीना नसीब था और पाना किस्मत।

कभी-कभी लगता है जैसे तुम मेरे सामने खड़े हो,
और सारी हक़ीक़त बेमानी हो गई हो।
जैसे पुराण की संन्यासी ने कहा था—
“वन को जो चला जाए, वह फिर सौंदर्य के पास नहीं लौटता।”
सही ही तो है—
जोगी कभी किसी के मीत नहीं होते।

तुमने कहा था—
“तुम्हारा न मिल पाना मेरी बदनसीबी है।”
क्या अजीब बात है—
यह बदनसीबी तो बहुत आसानी से आ जाती है,
पर तुम… तुम तो मिन्नतों से भी नहीं आते।

तुम्हें याद है?
तुमने कहा था मेरी प्रतीक्षा व्यर्थ है,
पर मुझे तो विरह प्यारा है—
क्योंकि विरह के बिना मेरी कविता साँस नहीं लेती।
पर सच यह है कि मेरा ये सच
तुम्हारी कल्पनाओं से बहुत दूर है—
जहाँ प्रतीक्षा की कोई कीमत नहीं,
जहाँ मिलन का कोई वायदा नहीं।

फिर भी,
मैं कोशिश करूँगी कि मेरे विरह का एक हवा का झोंका भी
तुम्हें छू न पाए,
और तुम्हारी उड़ान के रास्तों में
मेरे दर्द की ख़ाक न आए।
अगर मेरे सब कुछ लेने के बाद भी
तुम कुछ बन पाओ,
तो यही मेरी खुशकिस्मती होगी।

— शांभवी श्रीवास्तव

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पुरानी चाबी

 

एक पुरानी चाबी थी,
जंग लगी, खामोश पड़ी,
न सोने की, न चाँदी की,
बस समय की धूल में गड़ी।
वर्षों तक वह सोचती रही,
“मुझमें अब क्या बात रही?”
न कोई ताला ढूँढता है,
न मेरी कोई जात रही।नए ताले, नई कुंडियाँ,
नई-नई पहचान मिली,
पुराने संदूक़ों वाली दुनिया

धीरे-धीरे वीरान मिली।
एक दिन आधी रात समय
उसके पास ठहरकर बोला—
“इतनी चुप क्यों बैठी हो?
क्यों अपना अस्तित्व टटोला?”
चाबी हँसकर बोली उससे—
“अब मेरा उपयोग कहाँ?
जिन दरवाज़ों को खोलती थी,
अब उनका भी संयोग कहाँ?”समय मुस्काया, धीरे बोला—
यही तो तुम अनजान रही,
ताले खोलना काम तुम्हारा,
दरवाज़ा बनना शान नहीं।”“जो अपना कर्तव्य निभा जाए,
वह व्यर्थ कभी होता नहीं,
हर बीता मौसम मिट जाता,
पर अर्थ कहीं खोता नहीं।”दीप बुझे तो क्या होगा?
उसकी लौ का मान रहे।
फूल झरे तो क्या होगा?
मिट्टी में भी गान रहे।और सुनो…
दुनिया में सबसे दुखी वे नहीं
जो बूढ़े होकर छूट गए,
सबसे दुखी वे होते हैं
जो जीते-जी ही टूट गए।”तब पहली बार उस चाबी ने
अपने जीवन को पढ़ा नया।
वह ताला नहीं खोल रही थी,
वह खोल रही थी भाग्य नया।कुछ चीज़ें इतिहास नहीं,
आधार हुआ करती हैं।
कुछ चीज़ें दिखती कम हैं,
पर संसार हुआ करती हैं।आज भी वह चाबी चुप है,
पर मन में अभिमान नहीं।
जिसने अपना धर्म निभाया,
उससे बड़ा सम्मान नहीं।

क्योंकि जीवन का सबसे सुंदर
सत्य यही बतलाता है—
जो स्वयं को छोटा समझे,
अक्सर वही दरवाज़े खोल जाता है।

शारदा गुप्ता

Added:  June 22, 2026

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अंतर्निहित

 

जैसे नज़रें उठीं, वो प्रकट हो गई।

सूर्य को भ्रम हुआ, क्या ये नूतन रवि?

हे प्रकाशित, तो बिल्कुल वो मेरी तरह,

पर तपिश जो जलाती मुझे फिर कहाँ?

ना तो श्रद्धा है ये, ना है ये सची।

इस धरा की तो बिल्कुल वो लगती नहीं।

स्वर्ग में भी कभी मैं न देखा इसे।

क्या ये रचना नई या भ्रम है कोई?

 

संजना, तुम कहाँ? पथ दिखाओ ज़रा।

मैं भ्रमित हूँ बहुत, कुछ बताओ ज़रा।

हे दिवाकर, सुनी जितना मैं जानती,

अष्ट धातु का मिश्रण इसे जान लो।

पंच नदियों का जिसमें आवेग है,

षट् दर्शन का जिसमें समावेश है।

पंच अमृत के जैसा रसायन है वो,

पंच वीणा की जिसमें सधी तान है।

है उदित वो हुई बस अभी की अभी,

शिव की रचना है वो बस अभी की अभी।

 

जब वो चमकेगी, तुम डगमगा जाओगे।

जब वो फैलेगी, तो तुम समा जाओगे।

हे रवि, देखते तुम जिसे, वो है सोई हुई।

जब वो जागेगी, तो तुम कहाँ जाओगे?

 

संजना, तुम सुनो, मैं रवि हूँ, रवि।

जो तपिश है मेरी, उससे सब काँपते।

जब मैं देखूँगा, तो वो पिघल जाएगी।

मेरे जगमग तले वो ढल जाएगी।

हे प्रभाकर, सुनो, देख लो फिर ज़रा।

 

वो काया नहीं, वो एहसास है।

वो तुम्हारे उजाले का विज्ञान है।

संजना, तुम सुनो, मैं समर्पित हुआ।

गर्व मेरा अभी से पिघलने लगा।

ज्ञान उन्नत हुआ, पथ प्रदर्शित हुआ।

जो तपाती थीं मुझको, प्रभा बन गई।

और प्रभा से प्रभा मिल, विभा बन गई।

 

मनीष शुक्ला (Feb 13, 2026)

 

 

प्रेम एक बीज

प्रेम एक बीज की तरह पनपता हैं हमारे मन में,
और फिर अंकुरित होता हैं किसी दाने की भांति,
कुछ समय पश्चात वो ले लेता है एक लता का रूप,
और पहुंच जाता हैं आसमान की ऊंचाइयों पर,
जहां तक प्रेम के अलावा और कोई भाव हम तक
पहुंच ही नहीं पाते हैं,
लेकिन फिर एक दिन अचानक से वो जमीन पर गिर जाता हैं
और छोड़ देता है हमारी देह में और हमारी आत्मा में कुछ दाग,
जिन्हें मिटाया नहीं जा सकता,
फिर अंततः वह किसी दुखद घटना की भांति
हमारे मन में एक याद बनकर रह जाता हैं,
मगर वह कभी समाप्त नहीं होता,
प्रेम हमारे भीतर परमात्मा के अंकुश की तरह जन्म लेता है,
वह समंदर की लहरों में अपने उद्वेग के साथ उछलता जरूर है
मगर उसके पश्चात वह हमारे भीतर नदी के पानी की तरह बहता हैं,
प्रेम हम सबके भीतर सबसे अधिक रहता हैं,,,

अनुष्का चड्ढा (Nov 18, 2025)

उलझा मन

 

क्या गलती हुई, कुछ समझ नहीं आता ।

क्या सोचूं, क्या समझूं, कुछ समझ नहीं आता।

इतनी अनसुलझी क्यों हों गई हूं मैं?

इसे बुरा न लगे , उसे बुरा न लगे ; बस यही सोचूं।

मुझे क्या बुरा लगा , ये किसे बताऊं?

किसे समझाऊं अपने मन की बात?

डर लगता है कि फिर बुरा न लग जाए

अगर नहीं समझ आई मेरे मन की बात।

  

पूछे सदा मेरी आत्मा अपने ईश से

क्यों नहीं है मुझमें वो बेबाकी और वो बेफिक्री?

क्यों ये सोच का सैलाब सदा हिलोरे मारता है?

क्यों अंतर्मन सदा उद्वेलित रहता है?

 

बस हे ईश्वर! सही सोचने और करने की ऊर्जा दो।

फिर कोई क्या सोचे , क्या बोले, ये सोच ही मिटा दो।

 श्वेता  पटवारी

मई १९, २०२५

 

मेरे पापा

कई बार अपनी पुरानी इच्छाओं को किनारे किया होगा |
जब भी मैंने कुछ अपने लिए नया मांग लिया होगा ||

खिलौनों के बदले मुझसे एक सौदा भी किया था |
जब मुझसे मेरी ही सफलता का वचन लिया था ||

उसने जो किया, सिर्फ हम सबके सपनों के लिए किया |
मगर मेरे पापा ने अपने लिए कुछ नहीं लिया ||

थपकियाँ थप्पड़ों में भी परिणत हुईं |
मगर अच्छे-बुरे की सीख भी वहीं से शुरू हुई ||

नए कपड़े, नए जूते, हम सब के लिए लाते  रहे  |
पर वो अपनी पुरानी घड़ी और जूते ही चमकाते  रहे  ||

हमारी सफलताओं में अपनी खुशियों को ढूँढ़ लिया |
मगर मेरे पापा ने अपने लिए कुछ नहीं लिया ||

घर की वो छत तो आज भी मज़बूत है |
मगर घर खुद अब उस छाव से महरूम है ||

सब का हाल पूछते गए , और खुद का छुपाते  गए |
“तुम सब ख्याल रखना, मैं ठीक हूं”, कह कर हमें बहलाते  गए ||

स्वाभिमानी इतना, कि अंतिम समय में भी किसी का सहारा नहीं लिया |
आखिरतक, मेरे पापा ने अपने लिए कुछ नहीं लिया ||

कुणाल दत्त

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जब कुछ नहीं था, सब कुछ था।

 

आराम नहीं था पर उस तक जाने की राह थी,
अच्छा घर नहीं था पर महल बनाने की चाह थी,
धन नहीं था पर समय की भरमार थी,
मशहूर नहीं था पर दोस्तों में बड़ी हस्ती थी,
जब कुछ नहीं था, सब कुछ था।

गद्देदार आसान नहीं था पर ज़मीन पर ही ठाठ थी,
बिस्तर मख़मली नहीं था पर सितारों की गोद थी,
अंधेरा बिजली से रौशनमय नहीं था पर जुगनुओं की टिमटिमाहट असीम थी,
मन बहलाये ऐसा साधन नहीं था पर दादी की कहानियाँ बेहतरीन थी,
जब कुछ नहीं था, सब कुछ था।

हवाई जहाज़ में उड़ना नहीं था पर सपनों की उड़ान आसमानी थी,
विदेशों में घूमना नहीं था पर अपने मोहल्ले में ही दुनिया पूरी थी,
मोटर कार नहीं था पर अपनी साइकिल भी नहीं किसी से कम थी,
जीवन में सफल नहीं था पर अभाव में भी ख़ुशियाँ बेहिसाब थी,
जब कुछ नहीं था, सब कुछ था।

ज़िंदगी का तज़ुर्बा नहीं था पर जीने की समझ कहीं ज़्यादा थी,
सयाना नहीं था पर बचपन में हँसी बेशुमार थी,
जीवन आसान नहीं था पर जीने में सरलता थी,
कल का प्रावधान नहीं था पर ज़िंदगी आज की सुकून थी,
जब कुछ नहीं था, सब कुछ था।

हेमंत कुमार मिश्रा
अक्टूबर 9, 2024


सपना आया

सुनो दिकु…

सपना आया तेरे लौट आने का,
हर पल खुशी में बिताता हूँ मैं।
तेरी हंसी की गूंज में,
दिल खोलकर मुस्कुराता हूँ मैं।

तेरे आने की खबर से,
दिल को गज़ब का सुकून मिला है।
बड़ी मुद्दतों के बाद,
प्रेम के मन में खुशियों का सवेरा खिला है।

सपना आया तेरा हाथ मेरे हाथ में,
उस पल की मिठास को, दिल में बसाता हूँ मैं।
तेरा साथ पाने की आस में,
हर पल खुशियों से जी जाता हूँ मैं।

तेरे लौटने की आहट ने,
दिल में अनेक उमंग भर दी।
मेरी सुनी सी पड़ी कुटिया को,
हज़ारों दीपों से झगमगाता हूँ में।

सपना आया तेरे लौट आने का,
हर पल खुशी में बिताता हूँ मैं।
तेरी हंसी की गूंज में,
दिल खोलकर मुस्कुराता हूँ मैं।

प्रेम का इंतज़ार अपनी दिकु के लिए
प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”

प्रेम ठक्कर “दिकुप्रेमी”

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विनाश प्रगति पे है

 

अट्टालिका की ओट में छुप गई, कुटिया छोटे निवास

बढ़ते रहे जवानी के दिन, बढ़ता रहा विलास ॥

कीड़ों की तरह भर गये मानव, छोटे पड़ गये देश

जानवरों की जान पे बन आई, ऐसा हुया विकास  ॥ 

आसमान से पंछी गायब, विचरण करते ड्रोन

मगरमच्छ झीलों में दुबके, खा जायेगा नर पिशाच ॥ 

धरती को मथते रहे निस दिन, सब कुछ लिया निचोड़

सूखे ताल तल्लैया सारे, कालिख भरा आकाश ॥

 

सबको है किसी बात की जल्दी, चिल्ल पों कोहराम

डीज़ल का धुँवा कोहरे पे भारी, आब–ओ–हवा सत्यानाश ॥

अब सबका मोल है करता, शेयर का बाज़ार

सट्टे पे ज़ूआ सब खेलें, बस प्रॉफिट पे बिस्वास ॥ 

कहीं सूखे का रोना है तो, फैली कहीं मँहामारी

पर हम अपने कुएँ के मेंढक़, हमें कहाँ आभास ॥

पतन प्रलय सुनिश्चित है, कल्कि की जोहें बाट

कलज़ुग का प्रारब्ध यही है, नियति में है विनाश॥

 

संदीप सिंह

 

गंतव्य तेरी ही बाट निहारे  (posted on March 1, 2024)

 

उपलब्धियाँ अभी कई शेष हैं ,

राही ! राहों में रूका न कर

माथे तेरे आकाश बिराजे ,

तू बादलों सामने झुका न कर

 

क्या भय इस बात का है

जो पहली कोशिश ही विफल रही

जुट जा तू यूँ जान लगा कर

हर गलती को कर सही

 

अधिक से अधिक भला क्या होगा

मनोवांछित का ही साथ छिनेगा

जीत गए तो लाख खुशी,

जो हार गए तो पाठ मिलेगा

 

उस प्राप्त पाठ को अपने

जीवन का आदर्श रख कर तो देख,

गंतव्य तेरी ही बाट निहारे

तू मार्ग में चलकर तो देख |

 

वैदेही जौहरी

बचा – खुचा कलाकार (Posted Dec 20, 2023)

ढूँढो उसके पैर अब किराणे की कतारों में
बोल रूठे उससे ,गीत चुप ! सब इशारों में
बदलती थी किताबें पहले, अब मकाँ बदल रहे हैं,
कलम आधी रह गई है बढ़ते किरायों में

ज़िंदा पल में था ज़िंदा कब, उसे याद नहीं!
वजूद के सवाल पर, बहाने हैं, जवाब नहीं !
है उसकी आँखें “घर” बरसात की नमी का
कहता है हर ज़ख्म सीख है, कोई मलाल नहीं!

है दफ़्न इंकलाबी रूह, गुलामी की खाल में इन दिनों,
निगल रही है रोज़ प्यास इस शहर को,यही तो है सियासी चाल इन दिनों,
वो पहले नोचने को, हल्का सा स्पर्श कहते थे
अब बरसती है आग तो, आग को तेज़ाब लिख तू इन दिनों

ऐ कलाकार तू सूखे पेड़ पर कागज़ी एक पत्ता टांग आ
झुकते कन्धों के तू हाथ थाम, बूढी माँ के भी कुछ काम आ,
है रथ के पहिये टूटे सारथी अभी युद्ध बाकी है
तू मेरा हाथ थाम ,अधर्म की सीमा लाँघ जा

 दर्पण चंदलीय 

लिंक्स:

मेरा खज़ाना

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दीप्ति घोष

 

लिंक्स:

स्वप्न

कल रात चुपके से एक, नन्हा सा पंख मेरी बोझल पलकों, पर आ कर ठहर गया,
और बोला मुझसे.
मैं, चुन हुआ  स्वप्न हूँ तेरा,
मैं, अधिकार हूँ तेरा ।
तेरे लिए एक सौगात लाया हूँ,
तेरे लिए एक स्वप्न लाया हूँ,
तेरा ही खास हूँ,
तेरा ही कोमल स्पर्श से भरा
एहसास हूँ।

देखो तो, वो कैसे चुपके से आया,
और बड़ी ही स्नेहशीलता से,
उसने स्वप्नों  का बसेरा,   ना जाने,मेरी कोरी आँखों में  कब सजाया।
सुबह सवेरे जब मैं उठी,
तब माँ मुझसे बोली,
बड़ी खुश लग रही हो,
कुछ तो नई बात हुई है,
मुझे भी बतलाओ।

मैने माँ से कहा,
कुछ आशाएं जगी हैं माँ,
कुछ उम्मीदें पली  हैं,
कुछ नए हौंसले बुलंद हुए हैँ मन मैं,
एक नए दिवस की शुरुआत  हुई है।
मग़र मैं थोड़ी घबराई हुई हूँ माँ,
जो कोमल स्वप्न मेरे मन के आंगन में  खिले हैं,
क्या वो सुन्दर फूल बन कर  शाख पर खिलेंगे?
क्या मैं अपने स्वप्नों को ऊंची उड़ान दे, पाऊँगी?

तभी पंख मेरे कंधे पर आ कर मुझसे बोला,
तेरे स्वप्न तेरी पहचान  बनाएँगे,
तू आगे कदम बढ़ाऐगी,
वो, तेरी, हिम्मत बंधाऐगे,
आज गर हौंसला कर लेगी तू,
तेरे स्वप्न आज उसी बुलंदी से स्वप्नलोक कहलाएंगे।

तो बस फिर क्या था,
ना देखा ताक न तावन,
और खुद से मुस्करा कर बोली मैं,
अब जो भी दिशा हो आगे,
उसे मैं खुशी से अपनाऊँगी।
यही है मेरा स्वप्न,
गंगा सा पावन,
वीना की वाणी जैसा मधुर,
और यूँ ही चलते-चलते बस,
बन गया मेरा स्वप्न मेरा सखा आजीवन।

–अंजू कपूर

लिंक्स:

जीत के परचम

मन को लुभा रहे हैं,
ये फूल गुलमोहर के।

ये लाल -लाल लुच- लुच
डालों पे डोलते हैं।
कुछ ध्यान से सुनों तो,
शायद ये बोलते हैं।
सब लोग देखते हैं,
इनको ठहर -ठहर के।

चुन्ना ने एक अंगुली ,
उस और है उठाई।
देखा जो गुलमोहर तो,
चिन्नी भी खिलखिलाई।
मस्ती में धूल झूमे,
नीचे बिखर -बिखर के।

हँसते हैं मुस्कुराते,
ये सूर्य को चिढ़ाते।
आनंद का अंगूठा,
ये धूप को दिखाते।
हैं जीत के ये परचम,
उड़ते फहर- फहर के।

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

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आज कल के बच्चे

आज कल के बच्चे

उफ़ ,फूल कच्चे,
लेकिन देखो इनकी समझ
न सोचो इसमें कोईअसहज ,
सीख लेते हैं सब जल्दी से
नयी, पुरानी, आराम से ,

बात करते हे सोच के
इंटरनेट को गुरु मान के,
सारी चीज़ो की जानकारी,
कुछ अपेक्षित, कुछ बेकार,
मिल जाता है  सब आसानी से
एक बार कंप्यूटर खोलते ही,
हमसे  बेहतर , निडर
ज़िन्दगी में बेफिक्र,
कल का भविष्य ये बच्चे, 
मोबाईल, अंतराजाल में डूबे,
चलो, हमसे हैं बेहतर
आत्मविश्वासी और निडर,
देखा है  उन्होंने
उम्र से पहले ज़िन्दगी
चाहे कंप्यूटर में ही सही

सहाना प्रसाद

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इश्क़ 

इश्क़ नशा है, इश्क़ सुकूँ है, इश्क़ तलब है सासों की,
इश्क़ खुदा है, इश्क़ रज़ा है, इश्क़ गुज़ारिश रातों की|
मरना, मिटना, मिट कर जीना, आशिक की क्या बात कहें,
इश्क़ राग में बेबस राजा, बाज़ी है ये प्यादों की||

इश्क़ में देखें ऐसे मंज़र , दिल भी अब घबराता है, 
बात जुबां पर है लेकिन कहने से भी कतराता है |
इश्क़ में देखो ना जाने क्या हाल हुआ इन सासों का, 
बिना बताये थम ना जाएं, ये खतरा मंडराता है||

चलो इश्क़ की राहों पर तो कांटों से बचकर रहना, 
आएं खुशियां या फिर हो गम हसकर के सब सह लेना|
अंतहीन जो दिखलाए पथ, खून बहा दे आखों से, 
इश्क़ के राही हो तुम सीना चौड़ा कर कर कह देना ||

इश्क़ करें ये दुनिया वाले, इसमें कुछ भी पाप नही, 
करें बयां ये दिल के अरमां, सीने पर आघात नहीं| 
हम भी नैनों में अपने कुछ आस लगाए बैठे है
बाज़ी दिल की है ,सपनों का दाव लगाए बैठे है।
खबर किसे है किस्मत में क्या खेल रचाया जाएगा 

नशा, सुकून का पता नही पर दिल दुख कर रह जाएगा।।
करें बयां ये दिल के अरमां, सीने पर आघात नहीं| 
हम भी नैनों में अपने कुछ आस लगाए बैठे है
बाज़ी दिल की है ,सपनों का दाव लगाए बैठे है।
खबर किसे है किस्मत में क्या खेल रचाया जाएगा 
नशा, सुकून का पता नही पर दिल दुख कर रह जाएगा।।

रोहित गुप्ता (Feb 12, 2023)

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एक खालीपन सा है

अंधेरे में सन्नाटो में
चुप्पी से घिरी बातों में
एक खालीपन सा है।।
जज्बातों की उलझनों में
अपनों की सुलझनों में
एक खालीपन सा है।।
टूटे से ख्वाबों में
भटके हुए एहसासों में
एक खालीपन सा है।।
रूह की भटकन में
रिश्तों की अटकन में
एक खालीपन सा है।।
सड़क पर बिलखती इंसानियत में
गरीबी में डूबे बचपन में
एक खालीपन सा है।।
खुद से खुद की अजीब सी जंग में
दिल और दिमाग की इस उमंग में
एक खालीपन सा है।।
दौलत शोहरत के लिए भागती दुनिया में
बिकते हुए सच और झूठ में
एक खोखलापन सा है....
एक खालीपन सा है।।

प्रीतिका शुक्ला 'अखिला' (Feb 10, 2023)

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बता देंगे

बता दें वतन को अभी ये लाल जिन्दा है, 
हिला देगा धरा को गर घायल परिन्दा है। 
हुआ कश्मीर मे जो, उसे फिर होने नहीं देंगे,
बढ़े जो हाथ आंचल तरफ तो सिर ही उड़ा देंगे। 
मैं तेरा लाल हूं मां, मैं तुझको यह बता दूंगा।
तेरे चरणों में कतरा, खून का मैं बहा दूंगा। 
चुनर धानी पर तेरी मां दाग लगने नहीं दूंगा । 
तिरंगा ओढ कर आऊंगा लेकिन झुकने नहीं दूंगा। 
पिलाया दूध जो तूने उसी का कर्ज चुकाऐंगे, 
देकर जवानी हम अपनी तेरा मान बढ़ाएंगे। 
बहुत हुए समझौते अब हम एक ना मानेंगे,
अब सुनेंगे ना हम इनकी, सीधे घुस के मारेंगे।
तेरी अमृत की धारा से,विजय तिलक लगाएंगे।
विक्रम और मनोज को हम हर घर मे लाऐंगे।
तिरंगा है आन मेरी,तिरंगा शान है मेरी। 
इसे हर दिल का अरमान हम बनाएंगे

प्रीतिका शुक्ला ‘अखिला’ (Jan 21, 2023)

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दिया जल रहा था

दूर अन्धेरे में एक दिया जल रहा था
सब कुछ था रुका मानो वही चल रहा था
लेहरो को चीर वो आगे बढ़ रहा था
अन्धेरे में बस वही चमक रहा था
दूर अन्धेरे में एक दिया जल रहा था 

उस नदी के बहाव में बस वही दिख  रहा था
हर ग़म हर दुःख से परे वो बढ़ रहा था
दूर अन्धेरे में एक दिया जल रहा था 
ना अति भावुक और ना अति उत्तेजित वो शांत सा बढ़ रहा था
मानो उसे लक्ष्य था पता उसके लिए बढ़ रहा था
दूर अन्धेरे में एक दिया जल रहा था 

हवाएँ थीं तेज पर वो नहीं बुझ रहा था
अपने गंतवय को पाने के लिए हर मुसीबत से लड़ रहा था
दूर अन्धेरे में एक दिया जल रहा था 
पर उसे ना था मालूम क़ी हर वक़्त वो मर रहा था
द्रव्य उसके जीवन का कमतर हो रहा था
दूर अन्धेरे में एक दिया जल रहा था 

अब वो प्रकृति से नहीं खुद से लड़ रहा था
लौ हो रही थी कम उसका अंत हो रहा था
बहुत लड़ा खुद से लेकिन अंत में
सिर्फ़ उसके ऊपर धुआँ उड़ रहा था
दूर अन्धेरे में एक दिया जल रहा था

डॉ शिवम

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सर्टिफिकेट गुड  का 

माँ उठती है हर सुबह सूरज से भी पहले 
सुनती हैं वो हर पक्षी की पहली मीठी बोली, 
देखती है वो आसमान की लालिमा उगते, 
पर न जाने क्यों खुद को न सवारती वो कभी, 
घर के किनारों को चमकाना है उसका श्रृंगार, 
माँ बोलती, 'तभी तो कभी मिलेगा सर्टिफिकेट गुड का' 

आखों को मसलते हुए मै उठती हूँ रोज़ देर सवेर 
माँ माथे पर हाथ रख बोलती, 'अभी न हुई ज़्यादा सुबह 
सो जाओ थोड़ी देर और, पढ़ा है तुमने देर रात तक' 
चादर तानकर, आँखे बंद करके दोबारा, मै सोचती; 
फिर माँ क्यों उठ जाती है सुबह के सुबह होने से पहले ही, 
माँ बोलती, 'तभी तो कभी मिलेगा सर्टिफिकेट गुड का' 

घर के जन नाश्ता मांगते दस बजे, पर न कभी कहते माँ से, 
क्यों खाती वो खुद ही बनाया खाना ठंडा, बेस्वाद, बिन शिकायत, 
क्यों न कभी माँ पकाती खुद की पसंद के पकवान, 
क्यों न कभी कोई ये पूछता उससे, आखिर क्यों है माँ अदृश्य, 
'दिखने जो लग जाउंगी मै सबको, कीमत रह जाएगी और भी कम', 
माँ बोलती, 'तभी तो कभी मिलेगा सर्टिफिकेट गुड का' 

अदृश्य, अनसुनी, अनकही है मां की पहचान, माँ है बस माँ, 
कहती काफी है उसके लिए इतना ही - माँ, पत्नी, बहु, कभी रही बेटी भी 
माँ की न कोई शिकायत, न कोई मांग, न ही उसके है कोई सपने 
माँ बताती चित्रकारी करती थी वो युवापन में, पढ़ती भी थी अच्छा, 
उम्र जब बीती थोड़ी, आ गयी पराये घर को, पीछे छोड़ सारे सपने, 
माँ बोलती, 'सोचा था तभी तो कभी मिलेगा सर्टिफिकेट गुड का, 
पर अभी तक न मिला सर्टिफिकेट गुड का 
शायद कभी तो मिलेगा सर्टिफिकेट गुड का 
कभी तो, कही तो, कोई तो देगा माँ को,

एक सर्टिफिकेट गुड का’

 शुभांगी (Dec 26, 2022)

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तितलियाँ

डाली- डाली पे कली, बैठी गुल के पास |
रंग बिरंगी तितलियाँ, उड़े खुले आकाश ||
नीले अम्बर में खिली, उॅंजली- उॅंजली धूप |
सहज- सहज समीर चले, भू का खिलता रूप ||
वसुंधरा पे धुंध  की, दूर तक सजी सेज |
शीतल पवने जब चली, शीत हो गई तेज ||
आँचल  से पिघलती हुई, बर्फ सुनाती गीत |
रैन शीत दिन गुनगुने, ताप फिर गई बीत ||
अम्बर से बूदे गिरी, महकने लगे पात |
धीमे- धीमे दिन ढ़ले, आई शीतल रात ||

निहाल सिंह (Dec 12, 2022)

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बाल कविता 

तारा तारा, छोटा तारा
कितना सुन्दर, कितना न्यारा
दूर गगन में रहता है वो
बच्चों का है कितना प्यारा
छोटे छोटे हाथों से, बच्चे इसको छूना चाहें
पास बुलाके घर में इसको, मुट्ठी में ले जाना चाहें
ये मगर इठलाता रहता, हँसता रहता, गाता रहता
बच्चे फिर सो जाते थक कर
अगली रात फिर आता तारा
तारा तारा, छोटा तारा
कितना सुन्दर, कितना न्यारा

~कुमार ऋषि  (Dec 3, 2022)

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बहुत तड़पाती है

सुबह की पहली किरण ,
तुमसे ना मिलने की चुभन ,
दिल मे लगी वो अगन ,
बहुत तड़पाती है , बहुत तड़पाती है

शाम आती है बाहें फैलाये
हवा कुछ कहना चाहे पर कुछ कह ना पाए
बस एक चेहरा याद दिलाती है
बहुत तड़पाती है , बहुत तड़पाती है

नितिन सेठी  (Nov 11, 2022)

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