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Posted on Mar 17, 2016 in Bal Kavita, Frustration Poems | 2 comments

एक तिनका – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

एक तिनका – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

Introduction: See more

Here is a reality check. We may be proud and arrogant but a tiny particle fallen in our eyes may totally defeats us. Rajiv Krishna Saxena

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ
एक दिन जब था मुँडेरे पर खड़ा
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।

मैं झिझक उठा हुआ बैचैन सा
लाल होकर आँख भी दुखने लगी
मूठ देने लोग कपड़े की लगे
ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया
तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिये
ऐंठता तू किस लिये इतना रहा
एक तिनका है बहुत तेरे लिये।

∼ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

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2 Comments

  1. Can u please give the meaning of each paragraph of this poem.it will be very useful

    • ok

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