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Posted on Feb 10, 2016 in Contemplation Poems, Frustration Poems | 0 comments

निदा फाज़ली के दो गीत

निदा फाज़ली के दो गीत

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Famous poet Nida Fazli is no more. He died on 8th Feb, 2016. His poetry has such a deep penetrating insight into human phenomenon, inter-personal relations and living a life that it is as much unbelievable as it exhilarating. All lovers of poetry with deep meaning would be eternally grateful to him. Many of his poems are already on this site. Here are two more gems from him. Rajiv Krishna Saxena

पहला गीत

अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये

जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ नहीं
उन चिरा.गों को हवाओं से बचाया जाये

क्या हुआ शहर को कुछ भी तो नज़र आये कहीं
यूँ किया जाये कभी खुद को रुलाया जाये

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाये

खुदकुशी करने कि हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन अभी औरों को सताया जाये

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये

दूसरा गीत

जागे हुए मिले हैं कभी सो रहे हैं हम
मौसम बदल रहे हैं बसर हो रहे हैं हम

बैठे हैं दोस्तों में ज़रूरी हैं क़हक़हे
सबको हँसा रहे हैं मगर रो रहे हैं हम

आँखें कहीं, निगाह कहीं, दस्तो–पा कहीं
किससे कहें कि ढूंढो बहुत खो रहे हैं हम

हर सुबह फेंक जाती है बिस्तर पे कोई जिस्म
यह कौन मर रहा है, किसे ढो रहे हैं हम

शायद कभी उजालों के ऊँचे दरख्त हों
सदियों से आँसुओं की चमक बो रहे हैं हम

~ निदा फ़ाजली

 
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