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Posted on Jan 27, 2016 in Contemplation Poems, Life And Time Poems | 0 comments

मन को वश में करो, फिर चाहे जो करो – रमानाथ अवस्थी

मन को वश में करो, फिर चाहे जो करो – रमानाथ अवस्थी

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Vivekanand says that you can be free the moment you resolve to be free. And it is the understanding of truth that frees us. Once we understand the truth, it does not matter what we do in this world. Ramanath Awasthi puts it beautifully. Rajiv Krishna Saxena

मन को वश में करो
फिर चाहे जो करो।

कर्ता तो और है
रहता हर ठौर है
वह सबके साथ है
दूर नहीं पास है
तुम उसका ध्यान धरो
फिर चाहे जो करो।

सोच मत बीते को
हार मत जीते को
गगन कब झुकता है
समय कब रुकता है
समय से मत लड़ो
फिर चाहे जो करो।

रात वाल सपना
सवेरे कब अपना
रोज़ यह होता है
व्यर्थ क्यों रोता है
डर के मत मरो
फिर चाहे जो करो।

∼ रमानाथ अवस्थी

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