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Posted on Oct 15, 2015 in Contemplation Poems, Frustration Poems | 0 comments

बातचीत की कला – राजीव कृष्ण सक्सेना

बातचीत की कला – राजीव कृष्ण सक्सेना

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It is very important in the society to be able to communicate with fellow human beings. Capability to engage in small talk with natural ease is a great gift. Those who can’t do small talk are at a great disadvantage. In today’s world, people are becoming self-centered and the gift of ability to indulge in small talk is disappearing. Blessed are those who can naturally and spontaneously talk to anyone and everyone. Rajiv Krishna Saxena

समाज से मेरा रिश्ता
मेरी पत्नी के माध्यम से है
सीधा मेरा कोई रिश्ता बन नहीं पाया है
सब्जी वाला
दूध वाला
अखबार वाला
धोबी हो या माली
सबकी मेरी पत्नी से बातचीत होती रहती है
बस मुझे ही समझ नहीं आता कि
इन से बात करूँ तो क्या करूँ
पर मेरी पत्नी
सहज भाव से
इन सब से खूब बात कर सकती है
कूछ भगवान का वरदान है उसे
मुझे अक्सर ईर्षा होती है
मुझमें यह हुनर
क्यों नहीं है
जब पत्नी किसी आस पड़ोसी से
बात कर रही होती है
तब मैं चुपचाप पीछे से
मुँह छुपा कर निकल जाता हूँ
“बहुत बिज़ी रहते हैं”
पत्नी उन से बहाना बनाती है
पर सच तो यह है कि
मैं इतना बिज़ी नहीं हूँ
आराम से बातचीत करने का समय
निकाल सकता हूँ
पर मुझे ही समझ नहीं आता कि
इन से बात करूँ तो क्या करूँ

~ राजीव कृष्ण सक्सेना

 
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