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Posted on Sep 16, 2015 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

आज्ञा – राजीव कृष्ण सक्सेना

आज्ञा – राजीव कृष्ण सक्सेना

[A person who has been very active and useful to the society throughout his life, suddenly finds himself quite useless when he is old. He just lingers on wondering about his role. He prays to be taken away as he has nothing more to contribute. Rajiv Kishna Saxena]

प्रज्वलित किया जब मुझे कार्य समझाया
पथिकों को राह दिखाने को दी काया

मैंनें उत्तरदाइत्व सहज ही माना
जो कार्य मुझे सौंपा था उसे निभाना

जुट गया पूर्ण उत्साह हृदय में भर के
इस घोर कर्म को नित्य निरंतर करते

जो पथिक निकल इस ओर चले आते थे
मेरी किरणों से शक्ति नई पाते थे

मेरी ऊष्मा उत्साह नया भरती थी
पथ पर अपने वे बढ़ते ही जाते थे

पर धीरे धीरे पथ यह हुआ पुराना
पथिकों का कम हो गया यहां तक आना

मैं एक दीप था तम में राह दिखाता
पर कोई भी तो इधर नहीं अब आता

अस्तित्व दीप का पथिक नहीं तो क्या है
तट सूना हो तो कर्महीन नैया है

लौ मंद हुई अब क्षीण हुई बाती है
यादों की धड़कन रूकती सी जाती है

अब कार्य नहीं कुछ शेष मात्र जलता हूं
प्रभु बुझने की आज्ञा दें अब चलता हूं

∼ राजीव कृष्ण सक्सेना

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