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Posted on Sep 18, 2016 in Articles | 0 comments

तत्वचिंतनः भाग 8 ­बुद्धि­: वरदान या अभिशाप

तत्वचिंतनः भाग 8 ­बुद्धि­: वरदान या अभिशाप

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Contemplation, thinking and problem solving are unique features of human species. Evolution of life forms over last 1500 million years has produced countless species of animals and plants but human species, the epitome of the evolutionary process, has now virtually gone beyond normal Darwinian evolution. Human beings have been around only for last about 100,000 years but within this very short time they have used science to conquered all other life forms and even natural forces. Our ability to think, generate and transmit scientific knowledge has essentially been responsible for this pace of our development. It however now appears that the same attributes that were responsible for our rapid rise, could well be the cause for our equally rapid decline leading to a possible extinction. This seems to be our destiny. Rajiv Krishna Saxena

मैं बरामदे में बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था। अंदर से पत्नी और काम वाली बाई के वार्तालाप के अंश मेरे कानों में पड़ रहे थे। “पढ़ लिख कर दिमाग सातवें आसमान पर पहुंच गया है बीबी जी! अब हमारी कुछ सुनती ही नहीं। मनमानी करती है। मेरी बहन ने अपनी बेटी को ज्यादा नहीं पढ़ाया और शादी कर दी। उसके तो दो बच्चे भी हो चुके हैं। पर हमारी बेटी तो शादी ही नहीं करना चाहती…”

मैं सोचता रहा कि शादी, बच्चे और पढ़ाई क्या साथ साथ नहीं चल सकते। इधर कुछ दिनों से मैं डारविन की डेढ़ सौ साल पहले लिखी प्रसिद्ध पुस्तक “ओरिजिन आफ स्पीसीज़” यानि की “जीव प्रजातियों की उत्पत्ति” पढ़ रहा था। उस पुस्तक के निशकर्ष और हमारी काम वाली की पशोपेश में मुझे कुछ कुछ साम्यता का आभास हुआ। डारविन के विकासवाद के अनुसार प्रकृति में प्रत्येक जीव प्रजाति अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहती है और इसके लिये धीरे धीरे अपने आप को इस तरह परिवर्तित करती रहती है जिससे बदलते पर्यावरण में भी उसका अस्तित्व बना रहे। सच तो यह है कि “चाहती है” कहना भी एक तरह से ठीक नहीं है क्योंकि ऐसा नहीं होता कि कोई जीव विशेष बैठ कर सोचता हो कि मुझे अपनी प्रजाति की वृद्धि करनी चाहिये और अधिक से अधिक संतान की उत्पत्ति करनी चाहिये।या कि मुझे पर्यावरण के अनुसार बदलना चाहिये। जानवरों की प्रजातियां कभी भी सोच विचार कर के कुछ निर्णय नहीं लेतीं। वे तो मात्र आंतरिक सहज वृत्तियों के अनुसार चलती हैं। मौसम आने पर पूरी क्षमता से प्रजनन करती हैं और फिर नवजात बच्चों की देख रेख। इन सारे कार्यकलापों के पीछे कोई सोच समझ नहीं होती। बस सहज वृत्तियां होती हैं। इस मामले में जानवर एक प्र्रोग्राम्ड कमप्यूटर की तरह होते हैं। अपनी रक्षा के लिये लड़ना, जान बचाने के लिये भागना, खाना ढूंढना, प्रजनन करना और बच्चों की देखरेख सभी कुछ मात्र सहज वृत्तियों ह्यइंटरनल प्रोग्रामहृ के द्वारा निर्धारित होता है।

मानव ही एक ऐसा जानवर है जिसमे सोच विचार की क्षमता विकसित हुई।पर इसका मतलब यह नहीं कि हमारी आंतरिक सहज वृत्तियां लुप्त हो गईं। करोड़ो साल की जीव विकास प्रकिया के अंत में मानव की उत्पत्ति हुई और प्राचीन सहज वृत्तियां हमें विकास प्रक्रिया की विरासत के रूप में मिलीं। पर इनके ऊपर एक विकसित बुद्धि आ कर विराजमान हो गई जो कि हरेक आंतरिक वृत्ति के द्वारा प्रेरित कार्यों की समीक्षा करने लगी। यही मानव के दुखों और क्लेशों का मूल है। बुद्वि न होती तो हम भी और जानवरों की भांति मस्त घूमते, प्रकृति अनुसार कार्य करते और समय आने पर कूच कर जाते। बाइबल कहती है कि जो ज्ञान बढ़ाता है वही दुख पाता है। दुख ज्ञान से ही होते हैं। कुछ पता ही नहीं तो दुख कैसे होगा? यह कहावत आप सब ने सुनी होगी ­सबसे भले वे मूढ़ जिन्हें न व्यापे जगत गति।

मानव ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो कि अपनी बौद्धिक शक्ति से प्रकृति को अपनी सुविधानुसार ढालना चाहता है और विज्ञान के द्वारा ऐसा करने में सक्षम भी होता जा रहा है। अन्य सभी जीव प्रकृति के कार्य कलापों में ख़लल नहीं डालते बल्कि अपने आप को प्रकृति के अनुसार ढालते रहते हंै। प्रकृति में परिवर्तन के अनुकूल जीव का ढलना ही डारविन के विकासवाद का मूल मंत्र है। पर हम प्रकृति की दासता मानने को तैयार नहीं हैं। हम प्राकृतिक गर्मी सर्दी नहीं झेलना चाहते इसलिये वातानुकूलन का आविष्कार हमने किया।हमें ऊर्जा बहुतायत में चाहिये इसलिये हमने नदियों को बांध कर पनबिजली बनाई और आणुविक बिजलीघर भी इज़ाद किये। हम पैरों का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहते सो हमने कार बना ली।इसी तरह हमने विज्ञान के अनंत आविष्कार किये और यद्यपि इससे हमको आरामदायक जीवन शैली प्राप्त हुई, इसके नुकसान भी बहुत हुए और अधिकाधिक तेजी से हो रहे हैं। आज हमारे कल कारखानों और मोटर वाहन इतनी कार्वन डाइऑक्साइड गैस पैदा करते हैं कि मौसम के चक्र उथल पुथल होते जा रहे हैं। गर्मी बढ़ रही है और उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों की बर्फ तेजी से पिघल रही है जिससे समुद्री सतह बढ़ कर तटों का अतिक्रमण कर रही है। इतना प्रदूषण फैल रहा है और प््राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग इस कदर हो रहा है कि हमारा और अन्य जीव प्रजातियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ रहा है। हम ऐसे भीषण आणुविक और जैविक अस्त्र शस्त्र बना रहे हैं जो हमे सामूल विनाश की ओर ले जा सकते हैं। यह सब भी मानव बुद्धि द्वारा उपजित विज्ञान की ही देन हैं। हमारे साथ साथ पृथिवी पर बसने वाले बेचारे अन्य जीव भी हमारे किये का नतीज़ा भोग रहे हैं और उनकी प्रजातियां तेज़ी से नष्ट हो रही हैं। विज्ञान दुधारी तलवार है जिसके फायदे और नुकसान दोनो हैं। एक बार विज्ञान का जिन बोतल से निकला तो वापस अंदर डालना असंभव लगता है। अब लोगों को लगने लगा है कि प्राचीन युग की साधारण जीवन शैली शायद अधिक अच्छी थी। लोगों की आवश्यकताएं कम थीं और उससे पर्यावरण पर बुरा प्रभाव नहीं पड़ता था …

जीव विकास श्रंखला की आखिरी कड़ी यानि कि मानव अन्य जीवों के मुकाबले बेहद चालाक निकला पर अब यह चालाकी ही हमारी प्रजाति की विलुप्ति का कारण भी बन सकती है। ऐसा क्यों है इसे समझने का प्रयत्न करते हैं। करोड़ो वर्षों के जीव विकास के फल स्वरूप उपजे जीवों में ऐसी सहज वृत्तियां विकसित हो गईं थीं कि वे बिना सोच समझ के अपनी प्रजातियों का अस्तित्व कायम रखने में सक्षम थीं। मानव ने अपनी अधकचरी सोच समझ के द्वारा इन सहज वृत्तियों से संचालित कार्याें में अड़ंगा लगाना आरंभ कर दिया। कुछ उदाहरण लेते हैं।

प्रजाति के अस्तित्व को बनाए रखने में प्रजनन की मूलभूत आवश्यकता है, ना कि बुद्धिविकास की। प्र्रकृति को इससे कुछ लेना देना नहीं कि आप पी एच डी हैं या कि अनपढ़। उसके लिये तो प्रजनन की मूलमंत्र है। आप पूछेंगे कि शिक्षा का प्रजनन से क्या नाता है। पहला नाता तो यह है कि पढ़ने लिखने और कैरियर बनाने में वह बहुमूल्य समय बीत जाता है जिसमें युवावर्ग जातिवृद्धि कर सकता था। दूसरा नाता यह है कि शिक्षित व्यक्ति में शिक्षा और व्यक्तित्व विकास के साथ साथ एक तरह का स्वर्थीपन उत्पन्न होता है जिसके फलस्वरूप वह बच्चे पालने के उत्तरदाइत्व को बोझ मानने लगता है। मानव बुद्धि से ही विज्ञान की उत्पत्ति हुई और विज्ञान के द्वारा ही मानव ने गर्भनिरोध के उपायों का आविष्कार किया। जो आनंद प्रकृति ने रतिक्रिया में वंशवृद्धि के प्रोत्साहन के रूप में विकसित किया था उसे गर्भनिरोधक उपायों से मानव ने संतान की उत्पत्ति से अलग थलग कर दिया। यानि कि हम आनंद तो लेना चाहते हैं पर बच्चों का उत्तरदाइत्व नहीं उठाना चाहते। एक तरह से रतिक्रिया के आनंद को संतानोत्पत्ति से विलग होने के साथ ही मानव जाति का विलुप्तिकरण तय हो गया, ऐसा मुझे लगता है।

बुद्धिविकास महान गर्भ निरोधक है। इसके प्रमाण उपलब्ध हैं। जहां कहीं भी शिक्षा द्वारा ज्ञान विकास और व्यक्तित्व विकास बढ़ता है वहां ही जन्म दर में गिरावट आती है। भारत में जिस राज्य में निरक्षरता उन्मूलन जोर पकड़ता है वहीं जन्म दर घटती है। मेरे वैज्ञानिक मित्रों मे से किसी के भी एक या दो से अधिक बच्चे नहीं हैं। कुछों की तो एक भी औलाद नहीं है। जबकि शिक्षा प्रसार से पहले ह्यएक दो पीढ़ियों पहलेहृ परिवारों में बच्चों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत अधिक होती थी। पाश्चिमी देशों में जहां शिक्षा का सर्वाधिक विकास हुआ है वहां जनसंख्या वृद्धि दर अब नैगेटिव होती जा रही है। इसके चलते कुछ शताब्दियों में ही इन देशों में रहने वाले सफेद कॉकेसियन समाज लगभग लुप्त हो जाएंगे।उन्हें अभी से ही अपना अस्तित्व खतरे में दीखने लगा है। ऐसे देशों में बच्चे पैदा करने के लिये कई प्रोत्साहन की योजनाएं भी बनाई जा रही हैं। पर इससे कोई खास अंतर पड़ने वाल नहीं है। ऐसे प्रोत्साहनों के फलस्वरूप जनसंख्या दर मे बढ़ोतरी संभव नहीं लगती। इस विचार को आगे बढ़ाते हुए हम यह भी कह सकते हैं कि जो भी समाज शिक्षा एवं व्यक्तिगत विकास को जितनी तेजी से अपनाता हैै उतनी ही जल्दी वह अपनी विलुप्ति की ओर बढ़ता है।

ब्ुद्धि की सत्ता के विरुद्ध हमारी आंतरिक सहज वृत्तियां अक्सर जोर लगाती हैं जिसका सीधा अथवा परोक्ष प्रयोजन प्रजनन को बढ़ावा देना होता है। हमारी काम वाली बाई की सहज इच्छा कि उसकी बेटी शादी कर ले और संतान पैदा करे इसी आंतरिक वृत्ति को दर्शा रही थी।पश्चिमी देशों में गर्भपात के विरुद्ध आंदोलन भी जाति अस्तित्व कायम रखने की दिशा में एक सामाजिक सहज वृत्ति के रूप में देखा जा सकता है। पर शिक्षा से बुद्धिजीवी बनने की आधुनिक मुख्य धारा इन छोटे मोटे व्यवधानों को पीछे छोड़ते हुए तेज़ी से और बलशाली होती जा रही है।प्रजनन पिछड़ता जा रहा है।

किसी भी क्षेत्र में चिंतन करते हुए हमे वैल्यू जजमैंट ह्यवल्ुए ज्ुदग्म्एन्तहृ से बचना चाहिये और मात्र सत्य का निष्पक्ष अन्वेषण करना चाहिये। इस लेख को लिखने में मेरा अभिप्राय यह कदापि नहीं है कि बुद्धि को तिरस्कृत दृष्टि से देखा जाये। बुद्धि मानव की पहचान है और इसके बिना मानव पृथिवी पर सफल नहीं हो पाता, यह तो तय है। पर बुद्धि की सत्ता के परिणाम ही हमारी विफलता के कारण भी बन सकते हैं, इस सत्य को भी नकारा नहीं जा सकता। यह सत्य है कि मानव अपनी बुद्धि की शक्ति द्वारा ही बड़ी तेजी से अन्य जीवों से आगे निकला।पर हम अब इस कगार पर खड़े हैं जहां बुद्धि­जनित परिणाम हमारी प्रजाति को उतन्ी ही शीघ्रता से समाप्त भी कर सकते हैं। इस नियति में हम और आप कुछ विशेष नहीं कर सकते।

निसंदेह मानव का बुद्धिविकास‚ जीव विकास की प्रक्रिया में प्रकृति का एक विलक्षण प्रयोग था। यह प्रयोग कितना सफल होगा यह तो समय ही बतायेगा। करोड़ो वर्षों के जीव विकास रूपी सागर में विभिन्न जीव प्रजातियों के रूप में अनगिनित लहरें उठती और मिटती रही हैं। मात्र अस्तित्व काायम रखने की दृष्टि से कई प्रजातियां बहुत ही सफल रहीं हैं। उदाहरण के तौर पर तिलचट्टे ह्यकॉक्रोचहृ की प्रजातियां लगभग 35 करोड़ वर्षों से धरती पर है और कहते हैं कि यह प्रजाति इतन्ी मजबूत है कि इसका विलुप्त होना लगभग असंभव है। इसी तरह अधिकतर प्रजातियों का धरती जमे रहने का काल करोड़ों सालों में मापा जाता है। इससे सिद्ध होता है कि मानव जैसी बुद्धि न होना किसी प्रजाति के धरती पर अस्तित्व बनाये रखने के लिये आवश्यक नहीं है। मानव प्रजाति धरती पर मात्र एक दो लाख वर्ष से ज्यादा पुरानी नहीं है। पर पिछले कुछ सौ सालों में ही मानव नें धरती के पर्यावरण एवं संसाधनों पर ऐसा बुरा असर डाला है कि “बुद्धिशील” मानव का धरती पर अस्तित्व बनाये रखना बेहद कठिन प्रतीत होता है। गिरती जन्म दर‚ भीषण प्रदूषण‚ पानी की किल्लत‚ महायुद्धों की संभावना और बढ़ता भूमंडलीय तापमान उन कारणों में शामिल हैं जो कि मानव प्रजाति को नष्ट करने में मुख्य भूमिका निभा सकते हैं। अचरज नहीं कि मात्र कुछ एक हजार सालों में ही मानव प्रजाति अपने किये बुद्धिजनित कर्मों के फलस्वरूप अपना अस्तित्व खो बैठे। अगर ऐसा हुआ तो मानव रूपी लहर रेडार पर एक क्षणिक ब्लिप की तरह आ कर लुप्त हो जायगी। बुद्धि विकास का प्रकृति का प्रयोग तब असफल ही माना जायेगा। मानव लहर के धरती पर अपेक्षाकृत अतिशीघ्र उभरने और अतिशीघ्र विलय दोनो में विकसित बुद्धि एक महत्वपूर्ण कारण रहेंगे। शायद यही मानव जाति की नियति है।

~ राजीव कृष्ण सक्सेना

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