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Posted on Aug 24, 2015 in Articles | 0 comments

तत्व चिंतन: भाग 1 – तत्व चिंतन की आवश्यकता

तत्व चिंतन: भाग 1 – तत्व चिंतन की आवश्यकता

[With this article, I wish to start a series of articles that would follow very basics of the great thought process that characterizes the essential ethos of the Indian civilization. This unique civilization has continued in an uninterrupted fashion for thousands of years in the area south of the great Himalayas and the East of the river Sindhu. Population in this land mass has always been engrossed with questions about the nature and purpose of human life, and therefore this area has been the most fertile breeding ground for a wide spectrum of religions and philosophies of life. Purpose here is to give the interested readers a glimpse of these thoughts so that a greater awareness of our unique spiritual heritage may be created. Since I am a scientist by profession, you may expect a more scientific rather than religious interpretations of the thoughts. Feed-back from readers is encouraged. You can write to me at rajivksaxena@gmail.com – Rajiv K. Saxena]

मेरे एक मित्र वैज्ञानिक हैं। उम्र में मुझसे काफी बड़े हैं और अमेरिका में रहते हैं। जीव विज्ञान में मेरा अपना शोधकार्य मुझे अक्सर अमेरिका लाता रहता है और इन मित्र से यदा-कदा भेंट होती रहती है। बात उठने पर एक दिन कहने लगे कि हम हिंदू हैं पर इसका मतलब क्या है हमे नहीं पता। बस होली दिवाली मना लेते हैं जैसे बचपन में घर पर देखा था। कभी मौका मिलता है और मंदिर मे जाना होता है तो आंख मूंद कर हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते हैं। इन सब का मतलब भी कोई पूछे तो हमे पता नहीं। कोई अमेरिकी मित्र कभी हिंदू धर्म के बारे में कुछ पूछता है तो शर्म आती है कि हमे कुछ ठोस मालूम नहीं। इस बात को करीब बीस वर्ष हो गए पर यदा-कदा अभी भी यह बात मुझे याद आती रहती है। इन मित्र जैसा हाल और भी बहुत लोगों का होगा ऐसा मुझे लगता है।

पिछले कई दशकों से कैरियर बनाने की लगन हम लोगों पर कुछ ऐसी हावी हुई है विशेषतः विज्ञान पढ़ने वालों में कि धर्म और दर्शन की ज्ञान प्राप्ति के लिये कुछ भी समय निकाल पाना असंभव सा हो गया है। पर यह जानना है बहुत आवश्यक और इसका आभास तब होता है जब उम्र बढ़ती है कैरियर बन चुकता है और मन में एक अजीब सा खालीपन भर जाता है। तो क्या जीवन का मतलब यही था? पैसा कमाओ, बाल बच्चों को बड़ा करो, फिर एक दिन इस जग से रवाना हो जाओ? मंदिर हो आना, कुछ रटे रटाए मंत्र पढ़ लेना या त्यौहार मना लेना, धर्म के ऊपरी और सतही आयाम हो सकते हैं, पर एक चिंतनशील मनुष्य के लिये इनके पीछे छिपे दर्शन को जानना और उस पर मनन करना अति आवश्यक है। फिर हमारे देश में दार्शनिक चिंतन की एक अत्यंत प्रबल परंपरा रही है। उससे अनजान रहना एक अनमोल रत्न को खो देने के समान है। यह वस्तुतः दीपक तले अंधेरे जैसा है।

पहला प्रश्न तो यही उठता है कि धर्म और दर्शन की बात का क्या लाभ है? क्यों न खा पी कर मस्त रहा जाए ? मेरे विचार में ऐसा करना भी ठीक ही है। पर यह उसी समय तक संभव है जब तक कि जीवन संबंधी मूल भूत प्रश्न आपके अंतर से स्वयं ही न उठने लगें। ऐसा होने पर निजी आध्यात्मिक यात्रा पर चल देना आवश्यक हो जाता है। उससे पहले जोर जबरदस्ती धर्म की बात और दर्शन के उपदेशों का कुछ विशेष लाभ नहीं होता। यह तो हुई आपकी बात। पर अपने बच्चों को आप क्या धरोहर दे कर जाएंगे ? बच्चों में संस्कार डालने के लिये यह जानकारी आवश्यक है। उन्हें कम से कम इस बात से तो अवगत होना ही चाहिये कि बड़े होने पर और आवश्यकता होने पर उन्हें इन मूल भूत प्रश्नों का उत्तर धर्म और दर्शन में मिल सकता है। या कि उत्तर प्राप्त करने की प्रक्रिया का पता चल सकता है। इस प्रयोजन से बच्चों के मन में धर्म और दर्शन के कुछ मूल तत्वों की जानकारी अवश्य स्थापित कर देनी चाहिये। पर यह तभी हो सकता है यदि आप स्वयं इन मूल तत्वों से अवगत हों।

भारत एक अदभुत् और विलक्षण देश है। मैं यह बात देश प्रेम से प्रेरित हो कर नहीं कह रहा हूं। यहां यह भी कह दूं कि यह बात भी नहीं है कि हमारा देश सभी क्षेत्रों में महान है और इस में कोई भी त्रुटियां नहीं हैं। अवश्य हैं और इनका उल्लेख हम यदा-कदा करते ही रहेंगे। इस लेखमाला का आरंभ मैं जिज्ञासु पाठकों को भारतवर्ष में सहस्रो वर्षोें से चली आई गहन तत्व चिंतनधारा के मूल तत्वों से अवगत कराने के लिये कर रहा हूं। यह चिंतन धारा विश्व में अद्वितीय है और जो अनमोल रत्न हमारे चिंतकों ने इस चिंतन मनन से प्राप्त किये हैं उनकी एक झलक प्राप्त करना तो हम सभी के लिये एक परम सौभाग्य की बात होनी चहिये। आपकी अपनी आध्यात्मिक विकास क्रिया को भी इस तत्व चिंतन के बारे में जानने से अवश्य ही बढ़ावा प्राप्त होगा।

अगर कोई आप से पूछे कि धर्म को अंग्रेजी में क्या कहते हैं तो शायद आप कहेंगे रिलीजन (religion)। पर असल में हिंदी या संस्कृत में धर्म शब्द का वह मतलब नहीं है जो कि अंग्रेजी में रिलीजन शब्द का है। रिलीजन शब्द की जड़ रूल (rule) यानि कि नियम में निहित है और इसका तात्पर्य जीवन जीने के नियमों के रूप में लिया जा सकता है। भारतवर्ष में ऐसे नियम स्मृति नामक ग्रंथों में मिलते हैं। जैसे कि मनुस्मृति में प्राचीन भारत मे जीवन जीने के नियम दिये हुए हैं। हमारा समाज यह भली भांति समझता था कि भिन्न भिन्न युगों और देशों में यह नियम बदल सकते हैं और इसी लिये अलग अलग समयों में अलग अलग स्मृतियां लिखी गईं। अलग अलग समय में लिखे गये लगभग 18 भिन्न भिन्न स्मृति ग्रंथ आज भी उपलब्ध हैं। भारत में जीने के नियमों को धर्म के साथ कभी भी इतने पूर्ण रूप से नहीं जोड़ा गया जितना कि क्रिश्चिएनिटी या कि इस्लाम में। इस बात को थोड़ी गहराई से समझने की आवश्यकता है क्यों कि इसका ना समझना ही आज के युग की कई मुख्य समस्याओं के लिये उत्तरदाई है। मान लीजिये कि किसी संप्रदाय के कोई महापुरुष सैकड़ों वर्ष पहले कुछ ऐसे नियमों की हिदायत कर गए हों जो कि उनके समय तो उपयुक्त हो सकते थे परंतु आज की परिस्थितियों में अनुकूल नहीं है। तब क्या होगा? फिर अगर उनके अनुयायी आज भी उन्हीं नियमों को अक्षरतः लागू करना चाहें तो क्या अनर्थ नहीं होगा? अवश्य होगा और हो रहा है। यह समझना बहुत ही आवश्यक है कि नियम और कानून देश और समयानुसार बदल सकते हैं और सदा एक से नहीं रह सकते। रोज दो बार नहाने का नियम नदी किनारे रहने वाले को लिये ठीक हो सकता है पर रेगिस्ताान वासियों के लिये नहीं। इसी तरह किसी काल और देश विशेष में स्त्रियों का पुरुष के पूर्ण संरक्षण में रहना उपयुक्त हो सकता था पर वही नियम आज के युग में लागू करना संभव नहीं हो सकता। एक ही नियम को हर देश में और हर काल में जबरदस्ती लागू करने के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। हो रहे हैं।

उसके विपरीत धर्म में बदलाव नहीं होता। धर्म का वास्तविक मतलब किसी चीज में अन्तर्निहित उसके मूल कर्तव्य को समझना चहिये। जैसे कि कह सकते हैं कि अग्नि का धर्म प्रकाश और गरमाहट देना है। प्रकृति में हर वस्तु का कुछ न कुछ धर्म होता है। अगर अग्नि का धर्म हजारो वर्ष पहले प्रकाश देना था तो आज भी वही होगा और हजारो वर्ष बाद भी वही। इसी तरह कह सकते हैं कि गुरुत्वाकर्षण पदार्थ का एक धर्म है। वह कभी नहीं बदलेगा। धरती, चांद तारे, सूर्य, ग्रह उपग्रह, निहारिकाएं इत्यादि सब अपने धर्मानुसार गति कर रहे हैं और प्रकृति अपने धर्मानुसार। इसी विचार को आगे बढ़ाएं तो हम कह सकते हैं कि धर्म पर ही सकल विश्व कायम है।

इस तरह हमने जाना कि हिंदी या संस्कृत का शब्द “धर्म” अंग्रेजी के शब्द रिलीजन से अलग एक बहुत व्यापक अर्थ रखता है। रिलीजन का पर्याय कुछ सीमा तक “संप्रदाय” को माना जा सकता है। किसी मनुष्य से यह तो पूछा जा सकता हे कि उसका संप्रदाय क्या है और उसका उत्तर इसाई, इस्लाम या सिख हो सकता है। पर धर्म तो हर मनुष्य का एक ही हो सकता है। अब प्रश्न उठता है कि वह सार्वभौमिक मानव धर्म आखिर है क्या? जो व्यक्ति इस धरती पर जन्म लेता है उससे मूलतः क्या अपेक्षित है? What is after all the purpose of human life? पश्चिमी मजहबों के पास इस मूल प्रश्न का कोई साफ उत्तर नहीं है। पर इसके बारे में हिंदुओं की राय बिल्कुल स्पष्ट है। इसकी चर्चा करने से पहले हिंदू शब्द के मतलब पर भी थोड़ा विचार कर लेना चाहिये जिससे हम जान पाएंगे कि हिंदू शब्द भी धर्म की तरह ही व्यापक अर्थ रखता है।

कहते हैं कि हिंदू शब्द का प्रयोग पहले पहल पर्शिया ह्यआज के ईरान अफगानिस्ताान इत्यादि के निवासियों ने किया। उन्होंनें सिंधु नदी के पूरब में रहने वाले लोगों को हिंदू कहा। उनकी जुबान में “स” अक्षर नहीं है और उसकी जगह “ह” का प्रयोग होता है। इसलिये सिंधु का हिंदू हो गया। आप जानते हैं कि सिंधु नदी आज के पाकिस्तान में बहती है और पंजाब की पांच मुख्य नदियों में सबसे पश्चिम वाली नदी है (मानचित्र देखिये)। इसके पूरब में रहने वाले लोग भारतीय लोग हैं और इस तरह से हिंदू शब्द का मूल अर्थ सब भारत वासियों से था न कि किसी धर्म विशेष से। भारत विशाल देश है और इस देश में आध्यात्मिक ऊर्जा भी बहुत अधिक है। यहां पर अनगिनत धार्मिक रीतिरिवाजों और संप्रदायों को मानने वाले व्यक्ति और समाज एक साथ फले फूले हैं। पुरातन शैविक अराधना जिसके प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता में पाए जा रहे हैं, ऋगवैदिक प्राकृतिक देवी देवतााओं की पूजा, विष्णु के अवतारों की पूजा, जैन, बुद्ध, सिख धर्म से लेकर न्याय, वैशेषिक, सांख्य योग और मीमांसा एवम वेदांत दर्शनों तक कितनी ही पूजा, परिपाटियों और दर्शनों ने इस देश में जन्म लिया। हमारे पास वेद, पुराण, गीता, उपनिषद्, भागवत्, योग दर्शन, सहित धार्मिक ग्रंथों की एक विशाल धरोहर है और भिन्न भिन्न हिंदुओं की आस्था अलग अलग ग्रंथों में हो सकती है। इसके विपरीत इसाइयों और मुसलमानों में एक एक मूल धार्मिक ग्रंथ यानि कि बाइबल और कुरान ही मान्य हैं। इसी तरह मुसलमानों को दिन में कई बार नमाज़ पढनी होती है और इसाईयों को रविवार को गिरजाघर जाना ही होता है। हमारे धार्मिक रीतिरिवाज अनगिनत हैं। कुछ लोग मंदिर जाते हैं, कुछ तुलसी इत्यादि को जल चढ़ाते हैं, कुछ तरह तरह के योगाभ्यासों में विश्वास रखते हैं, और कुछ तो कुछ भी नहीं करते पर फिर भी सभी हिंदू हैं। हिंदूओं को कुछ भी विशेष करने की जोर जबरदस्ती नहीं है। आप कुछ भी न कर के हिंदू बने रह सकते हैं। इससे यह न समझिये कि यह अजीब धर्म है और इसका कुछ भी अर्थ नहीं है। सत्य तो यह है कि सर्वभौमिक (universal) हिंदू धर्म बड़ा धैर्यवान है और जानता है कि जोर जबरदस्ती लोगों को मंदिर में ढकेल कर कुछ प्राप्त नहीं होने वाला। जब किसी व्यक्ति विशेष में आस्था जागेगी और मन में धार्मिक प्रश्न उठेंगे तब वह स्वयं ही धर्म की ओर खिंचा चला आएगा। उस समय एक विशाल धर्मिक ग्रंथ राशि और विस्तृत विचार सागर उसे अपने स्वागत में और अपने में समा लेने के लिये तैयार मिलेंगे।

(क्रमंश:)

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