वही बोलें – संतोष यादव ‘अर्श’

वही बोलें – संतोष यादव ‘अर्श’

Santosh Yadav ‘Arsh’ is a very young poet who writes beautifully. He sent me his second book “Abhi hai aag seene main” from which I am presenting another of his poems. Rajiv Krishna Saxena

वही बोलें

सियासत के किले हरदम बनाते हैं, वही बोलें
जो हर मसले पे कुछ न कुछ बताते हैं, वही बोलें।

बचत के मामले में पूछते हो हम गरीबों से?
विदेशी बैंकों में जिनके खाते हैं, वही बोलें।

लगाई आग किसने बस्तियों में, किसने घर फूंके
दिखावे में जो ये शोले बुझाते हैं, वही बोलें।

मुसव्विर मैं तेरी तस्वीर की बोली लगाऊं क्या
जो अपनी चिकनी दीवारें सजाते हैं, वही बोलें।

विधायक ने क्यूं लूटी है दलित लड़की की अस्मत कल
जो उसके दम पे सरकारें चलाते हैं, वही बोलें।

मेरे बच्चे की आंते भूख से चिपकीं तो क्यूं चिपकीं
बड़ी संसद में आवाज़ें उठाते हैं, वही बोलें।

∼ संतोष यादव ‘अर्श’

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