गीली शाम – चन्द्रदेव सिंह

गीली शाम – चन्द्रदेव सिंह

Those who walked together got separated one day. Only memories remained and tears. Here is a beautiful poem of Chandradev Singh – Rajiv Krishna Saxena

गीली शाम

तुम तो गये केवल शब्दों के नाम
पलकों की अरगनी पर टांग गये शाम।
एक गीली शाम।

हिलते हवाओं में तिथियों के लेखापत्र
एक–एक कर सारे फट गये
केवल पीलपन –
पीलापन मुंडेरों पर‚
फसलें पर‚ पेड़ों पर
सूरज के और रंग
किरनों से छंट गये।
बूढ़ी ऋतुओं को हो चला है जुकाम।
तुम तो दे गये केवल शब्दों के नाम।

खिड़की ने आंगन ने‚
फूलों ने‚ फागुन ने
बार–बार पूछा –
किसमें देती उत्तर?
केचुल–से छोड़ दिये शब्दों ने अर्थ
खाली पड़े प्राणहीन अक्षर
तुम तो भाषा को भी कर गये बदनााम।
पलकों की अरगनी पर टांगी रही शाम।
एक गीली शाम।
एक गीली शाम।

∼ चन्द्रदेव सिंह

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