गाँव जाना चाहता हूँ – राम अवतार त्यागी

गाँव जाना चाहता हूँ – राम अवतार त्यागी

Human society evolved in villages. City based civilizations came later. Village life is generally simple and peaceful. City living may be complex and stressful. Those who migrated to cities from villages, at times wish to return back to simple life of villages. Rajiv Krishna Saxena

गाँव जाना चाहता हूँ

ओ शहर की भीड़ अब मुझको क्षमा दो
लौट कर मैं गाँव जाना चाहता हूँ।

तू बहुत सुंदर बहुत मोहक
कि अब तुझसे घृणा होने लगी है
अनगिनत तन–सुख भरे हैं शक नहीं है
किंतु मेरी आत्मा रोने लगी है
गाँव की वह धूल जो भूली नहीं है
फिर उसे माथे लगाना चाहता हूँ।

कीमती पकवान मेवे सब यहाँ हैं
गाँव के गुड़. की महक लेकिन नहीं है
शाम आकर्षक दुपहरी भी भली है
किंतु अब वे मस्तियों के दिन नहीैं हैं
गाँव से चलते हुए जो भी दिया था
वह वचन जाकर निभाना चाहता हूँ।

बाजरे की बाल–भुट्टे ज्वार मेरी
अब दुबारा टेरने मुझको लगी है
फूस वाला घर इशारा कर रहा है
और गाएँ हेरने मुझको लगी हैं
छद्म काफी दिन तलक ओढ़े रहा हूँ
आज उससे मुक्ति पाना चाहता हूँ।

ओ शहर की भीड़ अब मुझको क्षमा दो
लौट कर मैं गाँव जाना चाहता हूँ।

∼ राम अवतार त्यागी

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