पलायन संगीत – राजीव कृष्ण सक्सेना

At times life looks quite absurd and pointless. At those times, one feels trapped in existence and pines for a release. Here is an argument for escape at such times. Rajiv Krishna Saxena

पलायन संगीत

अनगिनित लोग हैं कार्यशील इस जग में
अनगिनित लोग चलते जीवन के मग में
अनगिनित लोग नित जन्म नया पाते हैं
अनगिनित लोग मर कर जग तर जाते हैं

कुछ कर्मनिष्ठ जन कर्मलीन रहते हैं
कुछ कर्महीन बस कर्महीन रहते हैं
कुछ को जीवन में गहन मूल्य दिखता है
कुछ तज कर्मों को मुक्त सहज बहते हैं

इस महानाद में एक व्यक्ति का स्वर क्या
अनगिनित तीर जब चलें मात्र इक शर क्या
अनगिनित पथिक पथ पर प्रयाण करते जब
उस महागमन में एक व्यक्ति का पग क्या

यह अंतहीन जग सारहीन लगता है
क्या निहित प्रयोजन पता नहीं चलता है
फंस गए प्राण क्यों अनायास इस घट में
नित अथक निर्रथक छल प्रपंच छलता है

कुछ चाह नहीं बस एक चाह अब मेरी
कब टूटेगा भ्रमजाल कहां है देरी
उठ रहा पलायन गीत मात्र अंतर में
बज रही नित्य अंतिम प्रयाण की भेरी

अब उठो देह तज मुक्त उड़ो अंबर में
अब काटो मायाजाल खड्ग लो कर में
जल सीमित होता है तो गदलाता है
सब सीमाएं अब तोड़ मिलो सागर में

∼ राजीव कृष्ण सक्सेना

 

Check Also

A house of glass ; A house of sand

शीशे का घर – श्रीकृष्ण तिवारी

Many apprehensions in life are conditional, depending upon some basic premise and notions. Once the …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *