जिस तट पर - बुद्धिसेन शर्मा

जिस तट पर – बुद्धिसेन शर्मा

Most people who are opportunists tend to compromise with principles. In this poem however, Buddhisen Sharma Ji strongly argues for not making such compromises – Rajiv Krishna Saxena

जिस तट पर

जिस तट पर प्यास बुझाने से अपमान प्यार का होता हो‚
उस तट पर प्यास बुझाने से प्यासा मर जाना बेहतर है।

जब आंधी‚ नाव डुबो देने की
अपनी ज़िद पर अड़ जाए‚
हर एक लहर जब नागिन बनकर
डसने को फन फैलाए‚
ऐसे में भीख किनारों की मांगना धार से ठीक नहीं‚
पागल तूफानों को बढ़कर आवाज लगाना बेहतर है।

कांटे तो अपनी आदत के
अनुसारा नुकीले होते हैं‚
कुछ फूल मगर कांटों से भी
ज्यादा जहरीले होते हैं‚
जिनको माली आंखें मीचे‚ मधु के बदले विष से सींचे‚
ऐसी डाली पर खिलने से पहले मुरझाना बेहतर है।

जो दिया उजाला दे न सके‚
तम के चरणों का दास रहे‚
अंधियारी रातों में सोये‚
दिन में सूरज के पास रहे‚
जो केवल धुंआं उगलता हो‚ सूरज पर कालिख मलता हो‚
ऐसे दीपक का जलने से पहले बुझ जाना बेहतर है।

~ बुद्धिसेन शर्मा

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3 comments

  1. Kya bat hai

  2. बहुत ही बेहतरीन कविता ऐसी कविता लिखने के लिए धन्यवाद

  3. प्रदीप भारद्वाज कवि

    हृदय स्पर्शी रचना ।
    सत्य सार्वभौमिक उद्गार ।

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