एक सीढ़ी और – कुंवर बेचैन

एक सीढ़ी और – कुंवर बेचैन

Life seems absurd and there seems no rhyme and reason for why things happen. Where would it all end? From birth to death, time just drifts away. Rajiv Krishna Saxena

एक सीढ़ी और

एक सीढ़ी और चढ़ आया
समय इस साल
जाने छत कहाँ है।

प्राण तो हैं प्राण
जिनको देह–धनु से छूटना है,
जिंदगी – उपवास
जिसको शाम के क्षण टूटना है,
हम समय के हाथ से
छूटे हुए रूमाल,
जाने छत कहाँ है।

यह सुबह, यह शाम
बुझते दीपकों की व्यस्त आदत
और वे दिन–रात
कोने से फटे जख्मी हुए ख़त
यह हथेली भी हुई है
मकड़ियों का जाल
जाने छत कहाँ है।

∼ कुंवर बेचैन

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