प्रभु आज्ञा दें  – राजीव कृष्ण सक्सेना

A person who has been very active and useful to the society throughout his life, suddenly finds himself quite useless when he is old. He just lingers on wondering about his role. He prays to be taken away as he has nothing more to contribute. Rajiv Kishna Saxena

प्रभु आज्ञा दें 

प्रज्वलित किया जब मुझे कार्य समझाया
पथिकों को राह दिखाने को दी काया

मैंनें उत्तरदाइत्व सहज ही माना
जो कार्य मुझे सौंपा था उसे निभाना

जुट गया पूर्ण उत्साह हृदय में भर के
इस घोर कर्म को नित्य निरंतर करते

जो पथिक निकल इस ओर चले आते थे
मेरी किरणों से शक्ति नई पाते थे

मेरी ऊष्मा उत्साह नया भरती थी
पथ पर अपने वे बढ़ते ही जाते थे

पर धीरे धीरे पथ यह हुआ पुराना
पथिकों का कम हो गया यहां तक आना

मैं एक दीप था तम में राह दिखाता
पर कोई भी तो इधर नहीं अब आता

अस्तित्व दीप का पथिक नहीं तो क्या है
तट सूना हो तो कर्महीन नैया है

लौ मंद हुई अब क्षीण हुई बाती है
यादों की धड़कन रूकती सी जाती है

अब कार्य नहीं कुछ शेष मात्र जलता हूं
प्रभु बुझने की आज्ञा दें अब चलता हूं

∼ राजीव कृष्ण सक्सेना

लिंक्स:

 

Check Also

Thanks at retirement function

धन्यवाद – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

Here is a moving poem by Shivmangal Singh Suman Ji. Towards the end of the …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *