आओ कुछ राहत दें – दिनेश मिश्र

Here is some philosophy of life from Dinesh Mishra. Third stanza shows how we unnecessarily get scared at times. Last stanza is my favorite. We accumulate so much experience through out the life, but the life ends before we get to test what we have learnt – Rajiv Krishna Saxena

आओ कुछ राहत दें

आओ कुछ राहत दें इस क्षण की पीड़ा को
क्योंकि नये युग की तो बात बड़ी होती है‚
अपने हैं लोग यहां बैठो कुछ बात करो
मुश्किल से ही नसीब ऐसी घड़ी होती है।

दर्द से लड़ाई की कांटों से भरी डगर
एक शुरुआत करें आज रहे ध्यान मगर‚
झूठे पैंगंबर तो मौज किया करते हैं
ईसा के हाथों में कील गड़ी होती है।

हमराही हिम्मत से बीहड़ को पार करो
आहों के सौदागर तबकों पर वार करो‚
जिनको हम शेर समझ डर जाया करते हैं
अक्सर तो भूसे पर ख़ाल मढ़ी होती है।

संकल्पों और लक्ष्य बीच बड़ी दूरी है
मन है मजबूर मगर कैसी मजबूरी है‚
जब तक हम जीवन की गुत्थी को सुलझायें
अपनी अगवानी में मौत खड़ी होती है।

— दिनेश मिश्र

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