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Posted on Nov 17, 2015 in Shabda Chitra Poems | 0 comments

सुप्रभात – प्रभाकर शुक्ल

सुप्रभात – प्रभाकर शुक्ल

Introduction: See more

Early morning has some magical moments when darkness give way to early diffused rays of light. The word starts to wake up slowly. Here is a poem describing the scene. Rajiv Krishna Saxena

नयन से नयन का नमन हो रहा है,
लो उषा का आगमन हो रहा है।

परत पर परत चांदनी कट रही है,
तभी तो निशा का गमन हो रहा है।

क्षितिज पर अभी भी हैं अलसाए सपने,
पलक खोल कर भी, शयन हो रहा है।

झरोखों से प्राची कि पहली किरण का,
लहर से प्रथम आचमन हो रहा है।

हैं नहला रहीं, हर कली को तुषारें
लगन पूर्व कितना जतन हो रहा है।

वही शाख पर हैं पक्षियों का कलरव,
प्रभाती सा लेकिन, सहन हो रहा है।

बढ़ी जा रही है जिस तरह से अरुणिमा,
है लगता कहीं पर हवन हो रहा है।

मधुर मुक्त आभा, सुगन्धित पवन है,
नए दिन का कैसा सृजन हो रहा है।

∼ डॉ. प्रभाकर शुक्ल

 

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