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Posted on Feb 10, 2016 in Shabda Chitra Poems | 0 comments

मांझी न बजाओ बंशी – केदार नाथ अग्रवाल

मांझी न बजाओ बंशी – केदार नाथ अग्रवाल

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Sitting on the river bank, you hear distant sound of flute being played by a Maanjhi (boat man). That melody takes you away from your worldly train of thoughts… Here is a famous poem written by Kedar Nath Agrawal Ji – Rajiv Krishna Saxena

मांझी न बजाओ बंशी
मेरा मन डोलता।
मेरा मन डोलता
जैसे जल डोलता।
जल का जहाज जैसे
पल पल डोलता।
मांझी न बजाओ बंशी‚ मेरा मन डोलता।

मांझी न बजाओ बंशी
मेरा प्रन टूटता‚
मेरा प्रन टूटता
जैसे तृन टूटता‚
तृन का निवास जैसे
वन वन टूटता।
मांझी न बजाओ बंशी‚ मेरा प्रन टूटता।

मांझी न बजाओ बंशी
मेरा तन झूमता।
मेरा तन झूमता है
तेरा तन झूमता‚
मेरा तन तेरा तन
एक बन झूमता‚
मांझी न बजाओ बंशी‚ मेरा तन झूमता

~ केदार नाथ अग्रवाल

 
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