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Posted on Feb 6, 2016 in Contemplation Poems, Inspirational Poems, Love Poems | 0 comments

तुम्हारी हंसी – कुसुम सिन्हा

तुम्हारी हंसी – कुसुम सिन्हा

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Laughter they say is the best medicine. After all life is so temporary and brooding on perceived losses serves no particular purpose. Fortunate are those of us who retain their ability to laugh off the adversities. Here is a description of such a heartfelt laughter by Kusum Sinha. I especially like the last three lines. Rajiv Krishna Saxena

कैसी है तुम्हारी हंसी?
ऊंचाई से गिरती जलधारा सी?
कल कल छल छल करती
मैं चकित सी देखती रह गई
सारी नीरवता सारा विषाद
तुम्हारी हंसी की धारा में बह गए
तुम्हारी हंसी है सावन की फुहार
भीगे मन प्राण
नीरस मरुथल से मन पर
जैसे बहार की हरियाली
तुम्हारी हंसी है मावस के बाद की
दूधिया चांदनी
या फिर सूखे में
अचानक फूट पड़ने वाला
मीठे पानी का झरना
उदास मन में जैसे
प्रेम का मीठा अहसास
भटकते मन को मिले जैसे
एक प्यारी पगडंडी
जलती दुपहरिया में
अचानक चले जैसे
ठंडी ठंडी मधुर बयार
शून्य विजन में जैसे
कूक पड़ी हो कोयल
सावन का पहला मेघखंड हो जैसे
एैसी ही तो है तुम्हारी हंसी
कैसे बचा पाए तुम?
इस निर्मम संसार में
अपनी यह हंसी?

∼ कुसुम सिन्हा

 
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