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Posted on Dec 16, 2015 in Life And Time Poems, Love Poems | 0 comments

तुम्हारा साथ – रामदरश मिश्र

तुम्हारा साथ – रामदरश मिश्र

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After the tensions of romantic love and egos subside over a decade or two, a gentle sense of camaraderie slowly engulfs married couples. Both partners become increasingly aware that no one in the whole world knows them better than they know each other. They have walked together and faced myriad problems of life together. World increasingly appears alien and even if they do not say so loudly, the only bliss they now have is in the company of each other. Here is a lovely poem of Ramdarash Mishra Ji. Rajiv Krishna Saxena

सुख के दुख के पथ पर जीवन
छोड़ता हुआ पदचाप गया,
तुम साथ रहीं, हँसते–हँसते
इतना लम्बा पथ नाप गया।

तुम उतरीं चुपके से मेरे
यौवन वन में बन कर बहार,
गुनगुना उठे भौंरे, गुंजित हो
कोयल का आलाप गया।

स्वप्निल स्वप्निल सा लगा गगन
रंगों में भीगी–सी धरती,
जब बही तुम्हारी हँसी हवा–सी
पत्ता–पत्ता काँप गया।

जाने कितने दिन हम यों ही
बहके मौसम के साथ रहे,
जाने कितने ही ख्वाब
हमारी आँखों में वह छाप गया।

धीरे–धीरे घर के कामों ने
हाथ तुम्हारे थाम लिये,
मेरा भी मन अब नये समय का
नया इशारा भाँप गया।

अरतन–बरतन चूल्हा चक्की
रोटी–पानी के राग उठे,
झड़ गये बहकते रंग हृदय में
भावों का भर ताप गया।

मैंने न किया तुमने न किया
अब प्यार भरा संवाद कभी,
बोलता हुआ वह प्यार न जाने
कब बन क्रिया कलाप गया।

झगड़े भी हुए अनबोला भी
पर सदा दर्द की चादर से,
चुपके से कोई एक–दूसरे का
नंगापन ढाँक गया।

इस विषय सफ़र की आँधी में
हम चले हाथ में हाथ दिये,
चलते–चलते हम थके नहीं
आखिर रास्ता ही हाँफ गया।

∼ रामदरश मिश्र

 
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