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Posted on Nov 23, 2015 in Love Poems | 0 comments

तुम – कुंवर बेचैन

तुम – कुंवर बेचैन

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Early phase of undeclared love is akin mild inebriated mental state where the lover is constantly lost in thoughts of his lady love. This poem describes the state with many metaphors. Rajiv Krishna Saxena

शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई–सी तुम
ज़िंदगी है धूप तो मदमस्त पुरवाई–सी तुम।

आज मैं बारिश में जब भीगा तो तुम ज़ाहिर हुईं
जाने कब से रह रहीं थीं मुझ में अंगड़ाई–सी तुम।

चाहे महफिल में रहूं चाहे अकेला मैं रहूं
गूंजती रहती हो मुझमें शोख़ शहनाई–सी तुम।

लाओ वो तस्वीर जिसमें प्यार से बैठे हैं हम
मैं हूं कुछ सहमा हुआ सा और शरमाई–सी तुम।

मैं अगर मोती नहीं बनता तो क्या करता ‘कुंवर’
हो मेरे चारो तरफ सागर की गहराई–सी तुम।

∼ कुंवर बेचैन

 
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