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Posted on Feb 10, 2016 in Love Poems | 0 comments

सबसे अधिक तुम्हीं रोओगे – राम अवतार त्यागी

सबसे अधिक तुम्हीं रोओगे – राम अवतार त्यागी

Introduction: See more

All of us have gone through those very private moments when we meet some one with whom we have a very special binding and who may care the most for us in this world. While others may be vocal and demonstrative but that special relationship is beyond words and can only be expressed in silence. This is a remarkable poem by Ram Avtar Tyagi Ji. So intensely private that one almost feels embarrassed in sharing it with the poet. What a gem! – Rajiv Krishna Saxena

आने पर मेरे बिजली-सी कौंधी सिर्फ तुम्हारे दृग में
लगता है जाने पर मेरे सबसे अधिक तुम्हीं रोओगे।

मैं आया तो चारण-जैसा
गाने लगा तुम्हारा आंगन;
हंसता द्वार, चहकती ड्योढ़ी
तुम चुपचाप खड़े किस कारण?
मुझको द्वारे तक पहुंचाने सब तो आये, तुम्हीं न आए,
लगता है एकाकी पथ पर मेरे साथ तुम्हीं होओगे।

मौन तुम्हारा प्रश्न चिन्ह है,
पूछ रहे शायद कैसा हूं
कुछ कुछ बादल के जैसा हूं;
मेरा गीत सुन सब जागे, तुमको जैसे नींद आ गई,
लगता मौन प्रतीक्षा में तुम सारी रात नहीं सोओगे।

तुमने मुझे अदेखा कर के
संबंधों की बात खोल दी;
सुख के सूरज की आंखों में
काली काली रात घोल दी;
कल को गर मेरे आंसू की मंदिर में पड़ गई ज़रूरत–
लगता है आंचल को अपने सबसे अधिक तुम ही धोओगे।

परिचय से पहले ही, बोलो,
उलझे किस ताने बाने में?
तुम शायद पथ देख रहे थे,
मुझको देर हुई आने में;
जगभर ने आशीष पठाए, तुमने कोई शब्द न भेजा,
लगता है तुम मन की बगिया में गीतों का बिरवा बोओगे।

∼ राम अवतार त्यागी

 
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