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Posted on Dec 14, 2015 in Frustration Poems, Life And Time Poems, Love Poems | 0 comments

राख – कैफ़ी आज़मी

राख – कैफ़ी आज़मी

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Many of our songs from the golden era are very perceptive and express deep feelings. This one written by the well known shair Kaifi Azami for the movie ‘Shola aur Shabnam’ is a good example. The feeling of despondency and having absolutely lost out on life are so clearly discernible. Rajiv Krishna Saxena

जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आँखें मुझमें
राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है

अब न वो प्यार न उस प्यार की यादें बाकी
आग यूँ दिल में लगी कुछ न रहा कुछ न बचा
जिसकी तस्वीर निगाहों में लिये बैठी हो
मैं वो दिलदार नहीं उसकी हूँ खामोश चिता

जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आँखें मुझमें
राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है

जिंदगी हँस के गुज़रती तो बहुत अच्छा था
खैर हँस कर न सही रो के गुज़र जाएगी
राख बरबाद मुहब्बत की बचा रखी है
बार बार इसको जो छेड़ा तो बिखर जाएगी

जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आँखें मुझमें
राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है

आरज़ू जुर्म वफ़ा जुर्म तमन्ना है गुनाह
ये वो दुनियाँ है जहाँ प्यार नहीं हो सकता
कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्हें समझाऊँ
बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता

जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आँखें मुझमें
राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है

∼ कैफ़ी आज़मी

 
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