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Posted on Feb 10, 2016 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems, Love Poems | 0 comments

पहली बातें – भवानी प्रसाद मिश्र

पहली बातें – भवानी प्रसाद मिश्र

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Human ego is such that it can totally incapacitate attempts for reconciliation between lovers even when they know in their heart that this is the right thing to do. But they still opt for a broken heart rather than a broken ego. That is what makes human frailties so enigmatic and lovable. Here is a superb poem by Bhawani Prasad Mishra – Rajiv Krishna Saxena

अब क्या होगा इसे सोच कर, जी भारी करने में क्या है,
जब वे चले गए हैं ओ मन, तब आँखें भरने में क्या है।
जो होना था हुआ, अन्यथा करना सहज नहीं हो सकता,
पहली बातें नहीं रहीं, तब रो रो कर मरने में क्या है?

सूरज चला गया यदि बादल लाल लाल होते हैं तो क्या,
लाई रात अंधेरा, किरनें यदि तारे बोते हैं तो क्या,
वृक्ष उखाड़ चुकी है आंधी, ये घनश्याम जलद अब जायें,
मानी ने मुहं फेर लिया है, हम पानी खोते हैं तो क्या?

उसे मान प्यारा है, मेरा स्नेह मुझे प्यारा लगता है,
माना मैनें, उस बिन मुझको जग सूना सारा लगता है,
उसे मनाऊं कैसे, क्योंकर, प्रेम मनाने क्यों जाएगा?
उसे मनाने में तो मेरा प्रेम मुझे हारा लगता है।

∼ भवानी प्रसाद मिश्र

 
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