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Posted on Mar 21, 2016 in Frustration Poems, Life And Time Poems, Love Poems | 4 comments

जब तुम्हीं अनजान बन कर रह गए – शांति सिंहल

जब तुम्हीं अनजान बन कर रह गए – शांति सिंहल

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Women have a world view that is very different from that of men. Women may seem involved and may even seem to participate enthusiastically in world affairs, but in heart of heart, their real focus remains on their love only. Nothing else really matters. This poem by Shanti Singhal comes from the heart of a woman… Rajiv Krishna Saxena

जब तुम्हीं अनजान बन कर रह गए‚
विश्व की पहचान लेकर क्या करूं?

जब न तुम से स्नेह के दो कण मिले‚
व्यथा कहने के लिये दो क्षण मिले।
जब तुम्हीं ने की सतत अवहेलना‚
विश्व का सम्मान लेकर क्या करूं?
जब तुम्हीं अनजान बन कर रह गए‚
विश्व की पहचान लेकर क्या करूं?

एक आशा एक ही अरमान था‚
बस तुम्हीं पर हृदय को अभिमान था।
पर न जब तुम ही हमें अपना सके‚
व्यर्थ यह अभिमान लेकर क्या करूं?
जब तुम्हीं अनजान बन कर रह गए‚
विश्व की पहचान लेकर क्या करूं?

दूं तुम्हें कैसे जलन अपनी दिखा‚
दूं तुम्हें कैसे लगन अपनी दिखा।
जो स्वरित हो कर न कुछ भी कह सकें‚
मैं भला वे गान लेकर क्या करूं?
जब तुम्हीं अनजान बन कर रह गए‚
विश्व की पहचान लेकर क्या करूं?

शलभ का था प्रश्न दीपक से यही‚
मीन ने यह बात दीपक से कही।
हो विलग तुम से न जो फिर भी मिटें‚
मै भला वे प्राण लेकर क्या करूं?
जब तुम्हीं अनजान बन कर रह गए‚
विश्व की पहचान लेकर क्या करूं?

अर्चना निष्प्राण की कब तक करूं‚
कामना वरदान की कब तक करूं।
जो बना युग युग पहेली सा रहे‚
मौन वह भगवान लेकर क्या करूं?
जब तुम्हीं अनजान बन कर रह गए‚
विश्व की पहचान लेकर क्या करूं?

~ शांति सिंहल

 
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4 Comments

  1. बहुत खूब!

  2. मै इनकी अन्य कविताएं भी पढ़ना चाहूँगा।

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