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Posted on Sep 14, 2015 in Love Poems | 0 comments

अगर डोला कभी – धर्मवीर भारती

अगर डोला कभी – धर्मवीर भारती

[Here is a lovely poem of Dharamvir Bharati about lovers who could not be together. Society would not let them This poem belongs to an era that is slowly fading away. See the helplessness in the line Preet hi sub kuchh nahin hai, Lok ki marjad hai sabse badi.. Rajiv Krishna Saxena]

अगर डोला कभी इस राह से गुजरे कुवेला,
यहां अम्बवा तरे रुक
एक पल विश्राम लेना,
मिलो जब गांव भर से बात कहना, बात सुनना
भूल कर मेरा
न हरगिज नाम लेना।

अगर कोई सखी कुछ जिक्र मेरा छेड़ बैठे,
हंसी मे टाल देना बात,
आंसू थाम लेना।

शाम बीते, दूर जब भटकी हुई गायें रंभाएं
नींद में खो जाए जब
खामोश डाली आम की,
तड़पती पगडंडियों से पूछना मेरा पता,
तुमको बताएंगी कथा मेरी
व्यथा हर शाम की।

पर न अपना मन दुखाना, मोह क्या उसका
कि जिसका नेह छूटा, गेह छूटा
हर नगर परदेस है जिसके लिये,
हर डगरिया राम की।

भोर फूटे भाभियां जब गोद भर आशीष दे दें,
ले विदा अमराइयों से
चल पड़े डोला हुमच कर,
है कसम तुमको, तुम्हारे कोंपलों से नैन में आंसू न आए
राह में पाकड़ तले
सुनसान पा कर।

प्रीत ही सब कुछ नहीं है, लोक की मरजाद है सबसे बड़ी
बोलना रुंधते गले से
ले चलो जल्दी चलो पी के नगर।

पी मिलें जब,
फूल सी अंगुली दबा कर चुटकियां लें और पूछें
क्यों
कहो कैसी रही जी यह सफर की रात ?
हंस कर टाल जाना बात,
हंस कर टाल जाना बात, आंसू थाम लेना
यहां अम्बवा तरे रुक एक पल विश्राम लेना,
अगर डोला कभी इस राह से गुजरे।

∼ धर्मवीर भारती

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