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Posted on Feb 16, 2016 in Life And Time Poems | 0 comments

सपन न लौटे – उदय भान मिश्र

सपन न लौटे – उदय भान मिश्र

Introduction: See more

Here is a nice poem by Balbir Singh Rang showing the perils of an one sided love. – Rajiv Krishna Saxena

बहुत देर हो गई
सुबह के गए अभी तक सपन न लौटे
जाने क्या बात है
दाल में कुछ काला है
शायद उल्कापात कहीं होने वाला है
डरी दिशाएं दुबकी चुप हैं

मातम का गहरा पहरा है
किसी मनौती की छौनी सी बेबस द्रवित उदास धरा है
ऐसे में मेरे वे अपने सपन लाडले
जाने किन पहाड़ियों से, चट्टानों से
लड़ते होंगे
जाने किधर भटकते होंगे
उड़ते होंगे

भला कहीं कोई तो ऐसा
जो कुछ मेरी मदद कर सके
जाए ढूंढे देखे मेरे सपन कहाँ हैं
और जहाँ हों वहीँ पहुंच कर
कह दे उन से
उनका पिता यहां चौखट पर दिए संजोए
विजय संदेशा सुनने की इच्छा में
विह्वल
उनकी राहें जोह रहा है

∼ उदय भान मिश्र

 
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