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Posted on Feb 6, 2016 in Bal Kavita, Life And Time Poems, Nostalgia Poems, Shabda Chitra Poems | 0 comments

पतंगों का मौसम – शिव मृदुल

पतंगों का मौसम – शिव मृदुल

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Raksha bandhan, Janmashtami and 15 August are the festivals when the sky in Northern India gets dotted by kites of wonderful colors. That madness engulfs every one. Strings tied to the eaten cob of corn (bhutta) act as Lai-langar to force down kites. There is a mad rush to grab the kites that have been cut loose from their strings (dor) by fierce battles of kites in the sky. Here is a lovely poem for children that describes the scene. Rajiv Krishna Saxena

मौसम आज पतंगों का है,
नभ में राज पतंगों का है।
इन्द्रधनुष के रंगों का है,
मौसम नई उमंगों का है॥

निकले सब ले डोर डोर पतंगें,
सुन्दर सी चौकोर पतंगें।
उड़ा रहे कर शोर पतंगें,
देखो चारों ओर पतंगें॥

उड़ी पतंगें बस्ती बस्ती,
कोई मंहगी, कोई सस्ती।
पर न किसी में फुट परस्ती,
उड़ा-उड़ा सब लेते मस्ती॥

चली डोर पर बैठ पतंगें,
इठलाती सी ऐंठ पतंगें।
नभ में कर घुसपैठ पतंगें,
करें परस्पर भेंट पतंगें॥

हर टोली ले खड़ी पतंगें,
कुछ छोटी कुछ बड़ी पतंगें।
आसमान में उड़ी पतंगें,
पेच लड़ाने बढ़ी पतंगें॥

कुछ के छक्के छूट रहे हैं,
कुछ के डोर टूट रहे हैं।
कुछ लंगी ले दौड़ रहे हैं,
कटी पतंगें लूट रहे हैं॥

∼ शिव मृदुल

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