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Posted on Dec 14, 2015 in Life And Time Poems, Nostalgia Poems, Shabda Chitra Poems | 0 comments

नखरे सलाई के – दिनेश प्रभात

नखरे सलाई के – दिनेश प्रभात

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In Northern India, summers are punishing. The heat stops social interactions and people are drained of energy. Rains release the stress but it is when the winter comes, the joy really returns. Here is a very nice poem that interprets the beginning of winters. Last stanza says that the God himself wakes up and the business of tying the sacred knot begins. Rajiv Krishna Saxena

आ गये दिन लौट कर,
कंबल रज़ाई के।

सज गये दूकान पर फिर ऊन के गोले,
पत्नियों के हाथ में टंगने लगे झोले,
देखने लायक हुए
नखरे सलाई के।

धूप पाकर यूं लगा, ज्यों मिल गई नानी,
और पापा–सा लगा, प्रिय गुनगुना पानी,
हो गये चूल्हे,
कटोरे रसमलाई के।

ले लिया बैराग मलमल और खादी ने,
डांट की चाबुक थमा ली आज दादी ने,
कान तक टोपा दिखा,
शैतान भाई के।

क्या शहरÊ क्या गाँव, क्या छोटा बड़ा तबका,
प्यार उमड़ा जा रहा है धूप पर सबका,
भेज दो अब तार,
सूरज को बधाई के।

उठ गये क्या देव? सोये भाग्य सब जागे,
टूटने–जुड़ने लगे फिर भाग्य के धागे,
हर तरफ चर्चे चले
मांडे–सगई के।

~ दिनेश प्रभात

 
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