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Posted on Jan 8, 2016 in Life And Time Poems, Nostalgia Poems | 0 comments

मैं सबसे छोटी होऊं – सुमित्रानंदन पंत

मैं सबसे छोटी होऊं – सुमित्रानंदन पंत

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When a child is young, his/her universe begins and ends in mother. Here is a simple and lovely poem from a child to her mother, written by Sumitranandan Pant. Rajiv Krishna Saxena

मैं सबसे छोटी होऊँ
तेरी गोदी में सोऊँ

तेरा आँचल पकड़-पकड़कर
फिरू सदा माँ तेरे साथ
कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ

बड़ा बनाकर पहले हमको
तू पीछे छलती है माँ
हाथ पकड़ फिर सदा हमारे
साथ नहीं फिरती दिन-रात

अपने कर से खिला, धुला मुख
धूल पोंछ, सज्जित कर गात
थमा खिलौने, नहीं सुनाती
हमें सुखद परियों की बात

ऐसी बड़ी न होऊँ मैं
तेरा स्‍नेह न खोऊँ मैं
तेरे अंचल की छाया में
छिपी रहूँ निस्‍पृह, निर्भय
कहूँ दिखा दे चंद्रोदय

∼ सुमित्रानंदन पंत

 
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