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Posted on Feb 24, 2016 in Life And Time Poems | 0 comments

चंद अशआर गुनगुनाते हैं – अरुणिमा

चंद अशआर गुनगुनाते हैं – अरुणिमा

Introduction: See more

Here is a lovely gazal by Arunima Ji. I first read it on eKavita, a yahoo group on Hindi and Urdu poetry run by Anoop Bhargawa – Rajiv Krishna Saxena

यों ही हम जहमतें उठाते हैं
चंद अशआर गुनगुनाते हैं

वे बताते हैं राह दुनियां को
अपनी गलियों को भूल जाते हैं

लेते परवाज़ अब नहीं ताइर
सिर्फ पर अपने फड़फड़ाते हैं

पांव अपने ही उठ नहीं पाते
वे हमे हर लम्हें बुलाते हैं

आप कहते हैं –क्या कलाम लिखा?
और हम हैं कि मुस्कुराते हैं

जिनको दरिया डुबो नहीं पाया
एक चुल्लू में डूब जाते हैं

उसके होठों की मय कभी पी थी
उम्र गुजरी है‚ लड़खड़ाते हैं

एक तस्वीर का सहारा ले
अपनी तन्हाइयां बिताते हैं

दर्द सीने में जब भी उठता है
ढाल लफ़्जों में हम सुनते हैं

∼ अरुणिमा

 
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