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Posted on Feb 16, 2016 in Frustration Poems | 0 comments

नाव चलती रही – वीरबाला भावसार

नाव चलती रही – वीरबाला भावसार

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Life is amazing. There are innumerable ways of living a life but we can follow only one. All other paths remain un-lived. Some times we may look wistfully at other paths and wonders how would it have been if we had followed those. Veerbala Ji says “I lived one truth but all other forms of truths remain unlived”, and in the end it perhaps does not matter – Rajiv Krishna Saxena

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।
कौन सी रागनी बज रही है यहां
देह से अजनबी प्राण से अजनबी
क्या अजनबी रागनी के लिये
जिंदगी की त्वरा यूँ मचलती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

रुक गए यूँ कदम मुद के देखूं जरा
है वहां अब भी जिन्दा दिली ताज़गी
राह कोई भी पकड़ू वहां के लिये
राह हर एक बच कर निकलती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

हर सुमन खिल रहा है बड़ी शान से
हर चमन उस पे सौ जान से फ़िदा
तू सुमन भी नहीं, तू चमन भी नहीं
शाख पर एक मैना चहकती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

धुप भी वही, चांदनी भी वही
जिंदगी भी वही, बानगी भी वही
कौन जाने कि क्यों एक धुंधली परत
बीच में यूँ कुहासे सी तिरती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

वृद्ध पापा हुए, मां बहुत ढल गई
जिंदगी सांप सी फन पटकती रही
क्या हुआ एक पीढ़ी गुज़र भी गई
इक नई पौध उगती उमगती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

सत्य है वह सभी जो कि मैंने जिया
सत्य वह भी कि जो रह गया अन जिया
कौन से तट उतरना कहां है मुझे
एक पाती हवा में भटकती रही

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही।

∼ डॉ. वीरबाला भावसार

 
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