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Posted on Nov 30, 2015 in Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

मैं जीवन में कुछ न कर सका – हरिवंश राय बच्चन

मैं जीवन में कुछ न कर सका – हरिवंश राय बच्चन

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This realization dawns on most of us sooner or later. I couldn’t do much in life. Couldn’t achieve anything worthwhile. So much could be done. Here is a poem of Harivansh Rai Bachchan. Rajiv Krishna Saxena

मैं जीवन में कुछ न कर सका…

जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्‍वाला लेकर आया था
मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका।
मैं जीवन में कुछ न कर सका…

अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था, लघु प्‍याला भी मैं भर न सका।
मैं जीवन में कुछ न कर सका…

बीता अवसर क्‍या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको, जब मरना था तब मर न सका।
मैं जीवन में कुछ न कर सका…

∼ हरिवंश राय बच्चन

 
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