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Posted on Feb 2, 2016 in Frustration Poems, Life And Time Poems, Poor People Poems | 0 comments

करो हमको न शर्मिंदा – कुंवर बेचैन

करो हमको न शर्मिंदा – कुंवर बेचैन

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A beggar is begging but the person he is begging from is himself in a bad shape. Here is nice poem by Kunwar Bechain. Honesty is a handicap for success in this day and age, is the subtle message. Rajiv Krishna Saxena

करो हमको न शर्मिंदा बढ़ो आगे कहीं बाबा
हमारे पास आँसू के सिवा कुछ भी नहीं बाबा।

कटोरा ही नहीं है हाथ में बस इतना अंतर है
मगर बैठे जहाँ हो तुम खड़े हम भी वहीं बाबा।

तुम्हारी ही तरह हम भी रहे हैं आज तक प्यासे
न जाने दूध की नदियाँ किधर होकर बहीं बाबा।

सफाई थी सचाई थी पसीने की कमाई थी
हमारे पास ऐसी ही कई कमियाँ रहीं बाबा।

हमारी आबरू का प्रश्न है सबसे न कह देना
वो बातें हमने जो तुमसे अभी खुलकर कहीं बाबा।

∼ कुंवर बेचैन

 
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