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Posted on Nov 30, 2015 in Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

जीवन का दाँव – राजेंद्र त्रिपाठी

जीवन का दाँव – राजेंद्र त्रिपाठी

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Life passes with a break-neck speed. As it passes, we are bewildered as to whether we did a good job or we failed in living a good life. What are the measures of success after all? In this confusion, the time to exit comes. Rajiv Krishna Saxena

भाग दौड़ रातों दिन
थमें नहीं पाँव।
दुविधा में हार रहे
जीवन का दाँव।

हर यात्रा भटकन के नाम हो गई
घर दफ्तर दुनियाँ में इस तरह बँटे
सूरज कब निकला कब शाम हो गई
जान नहीं पाए दिन किस तरह कटे।
बेमतलब चिंताएँ
बोझ रहीं यार
रास्ते में होगी ही
धूप कहीं छाँव।

अपनी हर सुविधा के तर्क गढ़ लिये
चार अक्षर पढ़ करके ढीठ हो गये
झूठे आडंबर के खोल मढ़ लिये
ख्रतरों में कछुए की पीठ हो गए
प्रगतिशील होने को
शहर हुए लोग
शहरों के चक्कर में
छूट गया गाँव।

~ राजेंद्र त्रिपाठी

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