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Posted on Oct 27, 2015 in Frustration Poems, Post-modern Poems | 0 comments

भंगुर पात्रता – भवानी प्रसाद मिश्र

भंगुर पात्रता – भवानी प्रसाद मिश्र

Introduction: See more

Being used by someone is an awful feeling. The sense of hurt is acute. Here is a lovely poem by Bhawani Prasad Mishra. Rajiv Krishna Saxena

मैं नहीं जानता था कि तुम
ऐसा करोगे
बार बार खाली करके मुझे
बार बार भरोगे

और फिर रख दोगे
चलते वक्त
लापरवाही से चाहे जहाँ।

ऐसा कहाँ कहा था तुमने
खुश हुआ था मैं
तुम्हारा पात्र बन कर।
और खुशी
मुझे मिली ही नहीं
टिकी तक मुझ में

तुमने मुझे हाथों में लिया
और मेरे माध्यम से
अपने मन का पेय पिया

स्थिति वह भंगुर
होकर भी
बुरी नहीं थी

मगर नरमी न बरतना जाते हुए
डाल देना हर कहीं
जमीन पर गाते हुए
अखर गई मुझे अपनी पात्रता।

मैं नहीं जानता था कि तुम
ऐसा करोगे
बार बार खाली करके
बार बार भरोगे
और चल दोगे अंत में
चाहें जहाँ डाल कर।

~ भवानी प्रसाद मिश्र

 
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