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Posted on Sep 21, 2015 in Frustration Poems, Poor People Poems | 0 comments

अनुभव परिपक्व – अज्ञेय

अनुभव परिपक्व – अज्ञेय

[A little kid in a poverty stricken family… makes natural child-like impulsive demands. Then by experience, learns to scale them down. Rajiv Krishna Saxena]

माँ हम नहीं मानते –
अगली दीवाली पर मेले से
हम वह गाने वाला टीन का लट्टू
लेंगे ही लेंगे –
नहीं, हम नहीं जानते –
हम कुछ नहीं सुनेंगे।

– कल गुड़ियों का मेला है
मुझे एक दो पैसे वाली
काग़ज़ की फिरकी तो ले देना
अच्छा मैं लट्टू नहीं मांगता –
तुम बस दो पैसे दे देना।

– अच्छा, माँ मुझे खाली मिट्टी दे दो –
मैं कुछ नहीं मांगूंगा:
मेले जाने का हठ नहीं ठानूंगा
जो कहोगी मानूंगा।

∼ सच्‍चिदानन्‍द हीरानन्‍द वात्‍स्‍यायन ‘अज्ञेय’

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