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Posted on Sep 28, 2015 in Desh Prem Poems | 0 comments

अरुण यह मधुमय देश हमारा – जय शंकर प्रसाद

अरुण यह मधुमय देश हमारा – जय शंकर प्रसाद

Introduction: See more

A lovely classic by Jai Shankar Prasad. Hindi is a bit difficult so I have provided the meanings of difficult words – Rajiv Krishna Saxena

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर नाच रही तरुशिखा मनोहर
छिटका जीवन हरियाली पर मंगल कुंकुम सारा।

लघु सुरधनु से पंख पसारे शीतल मलय समीर सहारे
उड़ते खग जिस ओर मुंह किये समझ नीड़ निज प्यारा।

बरसाती आंखों के बादल बनते जहां भरे करुणा जल
लहरें टकरातीं अनंत की पाकर जहां किनारा।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे भरती ढुलकाती सुख तेरे
मदिर ऊंघते रहते जब जगकर रजनी भर तारा।

अरुण यह मधुमय देश हमारा।

शब्दार्थः

  • अरुण ∼ प्रातःकाल की लालिमा
  • क्षितिज ∼ होराइजन (horizon)
  • तामरस ∼ तांबे के रंग की
  • विभा गर्भ ∼ सांझ
  • तरुशिखा ∼ पेड़ की फुनगी
  • कुंकुम ∼ केसर
  • लघु ∼ छोटे
  • सुरधनु∼ देवताओं के धनुष
  • समीर ∼ हवा
  • खग∼ पक्षी
  • निज नीड़ ∼ अपना घर
  • अनंत∼ इनफिनिट (infinite)
  • हेम कुंभ ∼ सोने का घड़ा
  • मदिर ∼ नशे में
  • रजनी ∼ रात

∼ जय शंकर प्रसाद

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