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Posted on Sep 3, 2015 in Contemplation Poems, Old Classic Poems | 1 comment

विश्व सारा सो रहा है – हरिवंश राय बच्चन

विश्व सारा सो रहा है – हरिवंश राय बच्चन

[In night when the whole world sleeps, some lay awake. Their heart full of grief, they are the ones whose tears keep company with the night. Rajiv Krishna Saxena]

हैं विचरते स्वप्न सुंदर,
किंतु इनका संग तजकर,
व्योम–व्यापी शून्यता का कौन साथी हो रहा है?
विश्व सारा सो रहा है!

भूमि पर सर सरित् निर्झर,
किंतु इनसे दूर जाकर,
कौन अपने घाव अंबर की नदी में धो रहा है?
विश्व सारा सो रहा है!

न्याय–न्यायधीश भू पर,
पास, पर, इनके न जाकर,
कौन तारों की सभा में दुःख अपना रो रहा है?
बिश्व सारा सो रहा है!

∼ हरिवंश राय बच्चन

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1 Comment

  1. is is tooo nice poem ……

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