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Posted on Jan 27, 2016 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

उँगलियाँ थाम के खुद – कुंवर बेचैन

उँगलियाँ थाम के खुद – कुंवर बेचैन

Introduction: See more

Expectations do not get realized in life, more often than they do. Here is a nice depiction by Kunwar Bechain. The poem especially seems to point to failed expectations from children when they grow up. Rajiv Krishna Saxena

उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे।

उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से
मैंने खुद रोके बहुत देर हँसाया था जिसे।

बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा
धूप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे।

छू के होंठों को मेरे वो भी कहीं दूर गई
इक गजल शौक से मैंने कभी गाया था जिसे।

दे गया घाव वो ऐसे कि जो भरते ही नहीं
अपने सीने से कभी मैंने लगाया था जिसे।

होश आया तो हुआ यह कि मेरा इक दुश्मन
याद फिर आने लगा मैंने भुलाया था जिसे।

वो बड़ा क्या हुआ सर पर ही चढ़ा जाता है
मैंने काँधे पे `कुँअर’ हँस के बिठाया था जिसे।

∼ कुंवर बेचैन

 
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