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Posted on Feb 6, 2016 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

तुम कभी थे सूर्य – चंद्रसेन विराट

तुम कभी थे सूर्य – चंद्रसेन विराट

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How fortune changes! Some one on top of the life goes under. Time is a great churner!! Here is a great poem by Chandrasen Virat Ji. Rajiv Krishna Saxena

तुम कभी थे सूर्य लेकिन अब दियों तक आ गये‚
थे कभी मुखपृष्ठ पर अब हाशियों तक आ गये।

यवनिका बदली कि सारा दृष्य बदला मंच का‚
थे कभी दुल्हा स्वयं‚ बारातियों तक आ गये।

वक्त का पहिया किसे कब‚ कहां कुचले क्या पता‚
थे कभी रथवान अब बैसाखियों तक आ गये।

देख ली सत्ता किसी वारांगना से कम नहीं‚
जो कि अध्यादेश थे‚ खुद अर्जियों तक आ गये।

देश के संदर्भ में तुम बोल लेते खूब हो‚
बात ध्वज की थी चलाई‚ कुर्सियों तक आ गये।

प्रेम के आख्यान में तुम आत्मा से थे चले
घूम फिर कर देह की गोलाइयों तक आ गये।

कुछ बिके आलोचकों की मानकर ही गीत को‚
तुम ऋचाएं मानते थे‚ गालियों तक आ गये।

सभ्यता के पंथ पर यह आदमी की यात्रा‚
देवताओं से शुरू की‚ वहशियों तक आ गये।

∼ चंद्रसेन विराट

 
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