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Posted on Dec 26, 2015 in Contemplation Poems, Life And Time Poems | 0 comments

साधारण का आनंद – भवानी प्रसाद मिश्र

साधारण का आनंद – भवानी प्रसाद मिश्र

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Here is an amazing poem that says what many of us have often felt. Some times meeting very successful men, very wealthy men makes us feel low and depressed. Meeting simple men with no airs puts us on ease and we truly enjoy that. Keen observant poet in Bhavani Prasad Mishra brings that feeling forth. Rajiv Krishna Saxena

सागर से मिलकर जैसे
नदी खारी हो जाती है
तबीयत वैसे ही
भारी हो जाती है मेरी
सम्पन्नों से मिलकर

व्यक्ति से मिलने का
अनुभव नहीं होता
ऐसा नहीं लगता
धारा से धारा जुड़ी है
एक सुगंध
दूसरी सुगंध की ओर मुड़ी है

तब कहना चाहिए
सम्पन्न व्यक्ति
व्यक्ति नहीं है
वह सच्ची कोई
अभिव्यक्ति नहीं है
कई बातों का जमाव है
सही किसी भी
अस्तित्व का अभाव है
मैं उससे मिलकर
अस्तित्वहीन हो जाता हूँ

दीनता मेरी
बनावट का कोई तत्व नहीं है
फिर भी धनाढ्य से मिलकर
मैं दीन हो जाता हूँ

अरति जन संसदि का मैंने
इतना ही अर्थ लगाया है
अपने जीवन के
समूचे अनुभव को
इस तथ्य में समाया है
कि साधारण जन
ठीक जन है
उससे मिलो जुलो
उसे खोलो
उसके सामने खुलो
वह सूर्य है जल है
फूल है फल है
नदी है धारा है
सुगंध है
स्वर है ध्वनि है छंद है
साधारण का ही
जीवन में आनंद है!

∼ भवानी प्रसाद मिश्र

 
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