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Posted on Dec 2, 2015 in Contemplation Poems, Frustration Poems, Life And Time Poems | 0 comments

राह कौन सी जाऊं मैं – अटल बिहारी वाजपेयी

राह कौन सी जाऊं मैं – अटल बिहारी वाजपेयी

Introduction: See more

There are dilemmas in life at every step. What to do? Which alternative to choose? And there are no authentic and correct answers. We must nonetheless make a choice. Rajiv Krishna Saxena

चौराहे पर लुटता चीर‚
प्यादे से पिट गया वजीर‚
चलूं आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति रचाऊं मैं‚
राह कौन सी जाऊं मैं?

सपना जन्मा और मर गया‚
मधु ऋतु में ही बाग झर गया‚
तिनके बिखरे हुए बटोरूं या नव सृष्टि सजाऊं मैं‚
राह कौन सी जाऊं मैं?

दो दिन मिले उधार में‚
घाटे के व्यापार में‚
क्षण क्षण का हिसाब जोड़ूं या पूंजी शेष लुटाऊं में‚
राह कौन सी जाऊं मैं?

~ अटल बिहारी वाजपेयी

 
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